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बजट- गरीबों पर मेहरबानी तो मिडिल क्लास पर मार!




आम बजट मिडिल क्लास को निराश करने वाला है तो उच्च वर्ग के लिये भी कोई खुशी देने वाला नहीं. गरीब और किसान को खुश करने का प्रयास जरूर किया गया है लेकिन किसान से ज्यादा फायदा गरीब को मिलता नजर आ रहा हैं.पिछले बजट की तरह इस बजट के पेश होने के पूर्व इंकम टैक्स पे करने वालों में से कई को यह उम्मीद थी कि उन्हें इस बार स्लेब में  छूट मिल सकती है लेकिन कोई छूट इस वर्ष के बजट में भी नहीं मिली. एक तरह से यह बजट किसानों और गरीबों पर केन्द्रित है,मिडिल  क्लास को तो एकदम किनारे कर दिया गया है.ऊपर से सर्विस टैक्स में वृद्वि और जीपीएफ का पैसा निकालने पर टैक्स वसूली ने सभी को हिलाकर रख दिया है.बजट में किसान से ज्यादा फायदा गरीब वर्ग को मिलेगा क्योंकि जिन योजनाओं का जिक्र किया गया है वह उन्हें तत्काल  मिल सकता है लेकिन किसानों के लिये ऐसा नहीं है.इस कड़ी में हम पिछले सप्ताह रेल मंत्री द्वारा प्रस्तुत कतिपय योजनाओं का जिक्र करते हुए यह कहना चाहेंंगे कि उन योजनाओं को पूरा करने में लम्बा वक्त लग सकता है. सरकार ने दोनों बजट पेश करने में इसी तकनीक को अपनाया है कि लोग इंतजार  करते रहें किन्तु इस बात का ध्यान नहीं रखा कि  'समय किसी का इंतजार नहीं करता.Ó जहां तक छत्तीसगढ़ का सवाल है मनरेगा के तहत छत्तीसगढ़ में अच्छा काम हुआ है इसके तहत अच्छी राशि बजट में स्वीकृत की गई है.बजट में अडतीस हजार पांच सौ करोड़ रूपयें के प्रावधान से इस बात की संभावना बलवती हुई है कि छत्तीसगढ़ को इसका अच्छा फायदा मिलेगा. सरकार 2.87 लाख करोड़ रूपयें ग्रामीण पंचायतो को बांटेगी. ग्राम पंचायतों के अधिकार में भी वृद्वि की बात कही गई है. हर गांव मं बिजली का फायदा छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों को मिल सकता है. छत्तीसगढ़ के कई गांवों में अब तक बिजली नहीं पहुंची है.बजट मेंं गरीब वर्ग का विशेष ध्यान रखा गया है. कुकिंग गैस के दायरे में सैकड़ों छोटे -छोटे गरीब परिवारों को लाने से इसका फायदा उन्हें मिलेगा.बजट एक नजर में देखने से मंहगाई के और बढऩे की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.कई मामलों में सरकार की चुप्पी यही दर्शाती है कि मंहगाई को कम करने का कोई प्लान सरकार के पास नहीं है.हालिया उदाहरण है स्वच्छ भारत अधिभार. सरकार ने यह सेस नवंबर में लगाया. जनता की जेब से फऱवरी तक 1,917 करोड़ रुपए निकल कर सरकार की तिजोरी में चले गए. इसी तरह से बीते दिसंबर में किराया बढ़ा दिया गया.कच्चे तेल की अंतरराट्र्रीय क़ीमतों में आई भारी गिरावट से हो रही बचत का 70-75 फ़ीसद हिस्सा (डीज़ल और पेट्रोल पर टैक्स बढ़ाकर) सरकार ने ख़ुद अपनी तिजोरी में रख लिया जबकि इसका 25-30 फ़ीसद हिस्सा पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में कम करके जनता को दिया जा रहा है.अगर क़ीमतें और कम की जातीं तो इससे महंगाई भी कम होती. ट्रांसपोर्ट लागत में डीज़ल की क़ीमतों का अहम हिस्सा होता है.भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि होलसेल प्राइस इंडेक्स पिछले 15 महीनों से नकारात्मक रहा है. लेकिन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बढ़ रहा है.सरकार ने ये सब तो नहीं बताया था बजट में कि ऐसा करेंगे. अब बताइए, बेचारे आम आदमी के लिए बजट हुआ ना बेमतलब का.120 करोड़ से ज़्यादा लोगों के इस मुल्क में 97 फ़ीसदी लोग आयकर या इनकम टैक्स नहीं देते हैं.अप्रत्यक्ष कर आम आदमी के लिए उत्पादन कर, सेवा कर जैसे या इस तरह की दूसरी ड्यूटी महत्व रखती है. इससे उसके इस्तेमाल की चीज़ें सस्ती या महंगी होती हैं.यह समझने की बात है कि हर वित्त मंत्री बताता है कि देंगे क्या, पर ये सब छुपा जाते हैं कि लेंगे क्या? मसलन उत्पादन कर सरकार ने बार-बार बढ़ाया.पिछले साल अप्रैल से दिसंबर के बीच अप्रत्यक्ष करों से वसूली कऱीब 33 फ़ीसदी बढ़ी. ऐसा नहीं कि इस दौरान देश में उत्पादन बढ़ा हो. सरकार ने ख़ुद बताया कि देश में उत्पादन कम हुआ है.पिछली बार भी बताया था लेकिन बाद में हुआ क्या? बजट में वित्त मंत्री ने कहा था कि महात्मा गांधी ग्रामीण रोजग़ार योजना (मनरेगा) बजट में भले कम पैसे का प्रावधान किया हो. लेकिन बाद में पैसे की कमी नहीं होगी. हुआ क्या? राज्यों ने जब पैसा माँगा तो सरकार ने दिया आधे से भी कम. नतीजा मज़दूरों को सूखा प्रभावित इलाक़ों में भी लंबे समय तक मज़दूरी नहीं मिली. मज़दूर अब इस योजना से भागने लगा है. बजट में यह तो नहीं बताया था. मज़दूरों और गाँवों में काम करने वाले कहते हैं कि यूपीए-2 और एनडीए दोनों इस योजना को मारना चाहते हैं.बजट की हक़ीक़त पता लगती हैं आठ-दस महीने बाद. उसके पहले बजट में जो प्रावधान करते हैं, उसे ख़र्चते नहीं हैं नए-नए बहानों तरीक़ों से पैसे जनता से निकालते रहते हैं.

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