सातवां वेतन आयोग क्या कर्मचारियों के तौर तरीको में भी बदलाव लायेगा?


सरकारी नौकरी यानी 'मस्ती-'शहंशाही नौकरी-'अलाली या जब मर्जी आये तब काम करो और निकल जाओ! सरकारी कर्मचारियों के बारे में लोगों को सदैव यह कहते सुना गया हैं 'यार काम करों या न करो तनख्वाह तो मिलना ही है. जब मर्जी आये तब आफिस जाओ, गप्पे सप्पे मारो और चाय पीने या लंच  के नाम से बाहर जाकर मटर गस्ती करते घूमते रहो. कई दिनों की छुट्टी,प्रोवीडन्ट फण्ड,बोनस, महंगाई भत्ता और भी कई सुविधाएं तो पकी-पकी  रहती है लेकिन अब आगे आने वाले वर्षों में सरकारी कर्मचारियों के लिये नौकरी कठिन होने वाली हैं.सरकार कर्मचारियों से काम लेगी, तभी पैसा देगी. अगर अलाली दिखाई तो घर का रास्ता दिखा दिया जायेगा-सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट संदेश दे रही है कि देश में और भी कई ईमानदार व काम करने वाले बेरोजगार हैं जिन्हें काम पर लगाया जा सकता है- आयोग कि सरकार को सिफारिश है कि जो अफसर या कर्मचारी काम किये बगैर कुर्सी पर बैठै- बैठे सरकार का खजाना खाली कर रहे हैं उन्हें नौकरी से निकालो. आयोग ने सरकारी कर्मचारियों के वेतनमान मे भारी बढ़ौत्तरी की है न्यूनतम वेतन सात हजार रूपये से बढ़ाकर अठारह हजार कर दिया है साथ ही भत्ते और अन्य सुविधाओं में भी वृद्वि की है किन्तु अब काम लेने का तरीका सरकार को ठीक वैसा ही रखना होगा जैसा निजी कंपनियों में काम करने वालों के साथ होता है.समय पर आओ,सद्व्यवहार करों और अच्छी तनख्वाह पाओं.सातवें वेतन आयोग में यह बात भी कही गई है कि कर्मचारी के व्यवहार,नेतृत्व क्षमता और कार्यकुशलता के आधार को भी पैमाना बनाया जाना चाहिये. आयोग की रिपोर्ट के आधार पर कर्मचारियों को बढ़ा हुआ वेतन अगले साल से मिलने की संभावना है लेकिन यह आयोगों के गठन के बाद पहला आयोग है जिसने वेतन बढ़ौत्तरी के साथ-साथ अच्छे से काम लेेने और दंडित करने का भी सुझाव सरकार को दिया है.केन्द्र सरकार के अनेक उपायों में यह रिपोर्ट खरा उतर रही है.सुधारात्मक सोच लेकर चल रही यह रिपोर्ट उसी के अनुकू ल है और संभावना इसी बात की है कि वह उसे जैसा का तैसा ही अंगीकार कर लें. वेतन आयोग ने अपनी सिफारिश में कर्मचारियों के वर्तमान वेतन लेने की मानसिकता पर जहां कड़ा प्रहार किया है वहीं पदोन्नति, वेतन वृद्वि व बोनस की मौजूदा व्यवस्था को ठीक नहीं माना है. अपने काम के प्रति कर्मचारी की बेपरवाही और कार्य का प्रदर्शन ठीक नहीं हाने जैसे मुद्दों पर भी आयोग ने ध्यान आकर्षित किया है. वास्तविकता यही है कि सरकारी काम शब्द ही वर्तमान स्थिति में हास्यास्पद बना हुआ है चूंकि लोग बोलचाल की भाषा में कहते हैं -क्या सरकारी काम जैसा कर रहे हो?

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