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आतंक के साये में विश्व,अब तो यह लगने लगा कि अगला सूरज देख पायेेंगे या नहीं?



एक साल के भीतर जिस तरह से आतंक का रूप विश्व में सामने आया है वह इंसानियत को सोचने के लिये मजबूर कर रहा है कि वह उसके लिये कितना खतरनाक है. भावी पीढ़ी को चिंतित होना चाहिये कि आने वाला भविष्य उसे कहां लेकर जाने वाला है? भारत हो या फ्रांस अथवा अन्य शांतिप्रिय देश सर्वत्र यह चिंता है कि निकलने वाला अगला सूरज उसे देखने मिलेगा या नहीं? जिस प्रकार जेहाद ने सिर्फ एक वर्ष में विश्व के नक्शे पर अपना सिक्का कायम किया है वह न केवल चिंतनीय है बल्कि पूरी मानवता को खतरे में डालने वाला है. हमारे प्रधानमंत्री ने ठीक कहा है कि संयुक्त राष्ट्र को तय करना चाहिये कि कौन आंतकवाद का साथी है और कौन मानवता के साथ है. मानवतावादियों को कुर्बानी के लिये तैयार रहना पड़ेगा. इस्लामिक संगठन आईएसआईएस जैसा आतंकवादी संगठन जिसने सिर्फ एक साल के अंदर पूरे विश्व में अपना झंडा गाड़ दिया है कि करतूते यह साबित करने के लिये काफी है कि यह सिलसिला थमने वाला नहीं. दुख तो इस बात का है कि हमारे बीच में ही कुछ लोग सारे मामले में मीरजाफर की भूमिका अदा कर रहे हैं. विश्व के साथ भारत कई सालों से आंतक के साये में है. वह अपनी धरती पर आंतकी खून के छीटे झेल चुका है और बार-बार विश्व समुदाय को उंगली उठाकर बता चुका है कि इसे रोकोयही इसकी जड़ में है किन्तु सदैव हमारे आसुओं को अनदेखा करता रहा.अब जब खुद पर आई तो समझ आ रहा है कि भारत सही था. अब भी देर नहीं हुई है पाक-सीरिया जैसे देशों में छिपे आंतकवादियों के खिलाफ एक ठोस एक्शन की जरूरत है. भारत यह सदैव विश्व समुदाय से कहता रहा है कि हमारा पड़ोसी आस्तीन का सांप है उसे कुचलने में हमारी मदद करो लेकिन इस समुदाय के ही बहुतो ने उसपर कोई कार्रवाई करने की जगह उसे संरक्षण प्रदान किया आज इसी का परिणाम है कि वह एटम बम लेकर न केवल हमें धमका रहा है बल्कि विश्व को भी चुनौती दे रहा है. हमारी स्थिति आज यह है कि एक तरफ खाई है तो दूसरी तरफ शेर. हम आज अपनी सीमा के चारो तरफ एक कठिन स्थिति का सामना कर रहे हैं. हमने अपने पूर्व के अनुभवों से यह सबक तो लिया है कि हम पर आने वाले संकट में हमें कौन मदद करता है लेकिन आज की स्थिति में हम चारो तरफ से धिरे हुए हंै-हमारे पड़ोस में हमारे खिलाफ षडयंत्र का जाल बुना जा रहा है. पहला पड़ोसी नेपाल दूसरा पाकिस्तान, तीसरा चीन और चौथा बंग्लादेश दिखाने के लिये सब ऊपर-ऊपर से मित्रता का दंभ भरते हैं लेकिन हकीकत यही है कि हमें पूरी तरह अपने शिकंजे में फांसने का जाल बुना जा रहा है. हाल में जो चौकाने वाले तथ्य सामने आये हैं वह यही इंगित कर रहा है कि विश्व स्तरीय संकट की स्थिति में हमें अपने बलबूते ही अपनी रक्षा करनी होगी. आंतक और पड़ोसियों की दगाबाजी से हमें ज्यादा नुकसान न हो इसके लिये यह भी जरूरी है कि हम विश्व के देशों के साथ अपने संबन्धों को और मजबूत बनाये. इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल का स्वागत किया जाना चाहिये कि उन्होंने अंदरूनी विरोध के बावजूद विदेशों में घूमकर बहुत नहीं तो कुछ देशों से अच्छी मित्रता कायम की है जो भविष्य में हमें आतंक से निपटने में बहुत हद तक मदद करेगा.

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