गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

विकास की छाया में पल गये कई टैक्स और कंकाल में बदल गया आम आदमी!



डेव्हलपमेंट की छाया में जो टैक्स थोपे जा रहे हैं उसने सामान्यजन के रास्ते को कठिन बना दिया है. वह न कुछ बोल पा रहा है और न कुछ कर पा रहा है जिसके पास पहले से मिल रही तनख्वााह है वह दुविधा में है और जिसके वेतन में बढ़ौत्तरी की गई है वह भी परेशान है.किसान ऋण के बोझ तले दबा है तो आम आदमी मंहगाई और भारी टैक्स के बोझ तले! किसानों ने ऋण को लेकर मौत को चुना तो अब आम आदमी भारी टैक्स और मंहगाई को लेकर फ्रस्टेशन में हैं, उसके सामने परिवार चलाने की समस्या है. केन्द्र की नई सरकार ने तो पिछले एक साल में टैक्स लादा ही है वहीं राज्यों की सरकार और इन राज्य सरकारों के अधिनस्थ काम करने वाली स्वायत्त संस्थाओं ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. विकास के नाम पर हमारी जेब से पैसा निकालना जारी है. चाहे वह किसी भी टैक्स के रूप में क्यों न हो. सड़क पर चलो तो टोल टैक्स और घर में बैठों तो स्वच्छता के नाम पर! लेकिन सुविधाएं जो इन टैक्सों के नाम पर कथित रूप से दी जा रही है वह किसी देने वाले को पता ही नहीं चल रही. जबकि वह इन्कम टैक्स भी पटा रहा है,संपत्ति कर भी पटा रहा है और सैकड़ों अन्य कर भी पटा रहा है साथ ही कचरा फैकने का टैक्स भी दे रहा है. कई घरों में न पानी आता है न कचरा उठता है, न स्ट्रीट लाइट जलती है फिर भी उससे टैक्स वसूली होती है-टैक्स लने की इस विभिन्नता ने सामान्य वर्ग को कहीं का नहीं छोड़ा. किसी को यह पता ही नहीं कि उनकी जेब से कटने वाले पैसे से कथित विकास कहां हो रहा है. हां यह जरूर सुनाई दे जाता है कि फलाना इतना पैसा खा गया और फलाने की कोठी से ढेरों नगदी बरामद हुई. क्या
हमारेे पैसे का ऐसा ही उपयोग हो रहा है? केन्द्र सरकार ने अपने बजट में ट्रेनों में यात्री किराये में बढ़ौत्तरी की, इन्कम टैक्स पटाने के लेवल में कोई खास संशोधन नहीं किया. माल भाड़े में बढ़ौत्तरी का नतीजा यह हुआ कि सारी  वस्तुओं के दामों में वृद्वि हुई. दाल अब तक की सबसे ऊंचार्ई पर है. प्राय: हर भारतीय की थाली में अनिवार्य रूप से रहने वाली यह वस्तु ही मंहगी हो जाये तो इसके बाद तो कुछ कहना ही क्या? प्याज का यही हाल है. सेवा कर के नाम से वसूल होने वाली राशि हर आदमी के लिये मुसीबत बनी हुई है. प्राय: राज्य सरकारों ने इसे अपनी कमाई का जरिया बना रखा है. एक सामान्य परिवार को क्या-क्या करना पड़ता है?-परिवार का स्वास्थ्य,परिवार की परवरिश जिसमें उसकी रसोई, बच्चों की पढ़ाई, उनकी फीस , कपड़े, हास्टल फीस,टेलीफोन किराया,और न जाने क्या-क्या? इसके अलावा घर की भारी बढ़ी हुई बिजली, नगर निगम का संपत्ति कर,जल कर, सफाई कर और अन्य कई अघोषित कर. प्राय: हर घर में गैस,पेट्रोल डीजल से चलने वाले वाहन की सुविधा है. पेट्रोल डीजल के भाव में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आई कमी ने कुछ राहत जरूर दी है लेकिन अगर यह भी नहीं होता तो? हमारी स्थिति कर्ज में पैदा होने और कर्ज में मरने वाली पुरानी कहावत पर आज भी विद्यमान है. इस दौर में भगवान किसी को बीमार न करें अगर बीमार हुआ तो समझ लीजिये सारे परिवार पर मुसीबत आ गई क्योंकि अस्पताल में भरती होते ही अस्पताल के बिल को सुनकर उनकी आधी मौत हो चुकी होती है.