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विकास की छाया में पल गये कई टैक्स और कंकाल में बदल गया आम आदमी!



डेव्हलपमेंट की छाया में जो टैक्स थोपे जा रहे हैं उसने सामान्यजन के रास्ते को कठिन बना दिया है. वह न कुछ बोल पा रहा है और न कुछ कर पा रहा है जिसके पास पहले से मिल रही तनख्वााह है वह दुविधा में है और जिसके वेतन में बढ़ौत्तरी की गई है वह भी परेशान है.किसान ऋण के बोझ तले दबा है तो आम आदमी मंहगाई और भारी टैक्स के बोझ तले! किसानों ने ऋण को लेकर मौत को चुना तो अब आम आदमी भारी टैक्स और मंहगाई को लेकर फ्रस्टेशन में हैं, उसके सामने परिवार चलाने की समस्या है. केन्द्र की नई सरकार ने तो पिछले एक साल में टैक्स लादा ही है वहीं राज्यों की सरकार और इन राज्य सरकारों के अधिनस्थ काम करने वाली स्वायत्त संस्थाओं ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. विकास के नाम पर हमारी जेब से पैसा निकालना जारी है. चाहे वह किसी भी टैक्स के रूप में क्यों न हो. सड़क पर चलो तो टोल टैक्स और घर में बैठों तो स्वच्छता के नाम पर! लेकिन सुविधाएं जो इन टैक्सों के नाम पर कथित रूप से दी जा रही है वह किसी देने वाले को पता ही नहीं चल रही. जबकि वह इन्कम टैक्स भी पटा रहा है,संपत्ति कर भी पटा रहा है और सैकड़ों अन्य कर भी पटा रहा है साथ ही कचरा फैकने का टैक्स भी दे रहा है. कई घरों में न पानी आता है न कचरा उठता है, न स्ट्रीट लाइट जलती है फिर भी उससे टैक्स वसूली होती है-टैक्स लने की इस विभिन्नता ने सामान्य वर्ग को कहीं का नहीं छोड़ा. किसी को यह पता ही नहीं कि उनकी जेब से कटने वाले पैसे से कथित विकास कहां हो रहा है. हां यह जरूर सुनाई दे जाता है कि फलाना इतना पैसा खा गया और फलाने की कोठी से ढेरों नगदी बरामद हुई. क्या
हमारेे पैसे का ऐसा ही उपयोग हो रहा है? केन्द्र सरकार ने अपने बजट में ट्रेनों में यात्री किराये में बढ़ौत्तरी की, इन्कम टैक्स पटाने के लेवल में कोई खास संशोधन नहीं किया. माल भाड़े में बढ़ौत्तरी का नतीजा यह हुआ कि सारी  वस्तुओं के दामों में वृद्वि हुई. दाल अब तक की सबसे ऊंचार्ई पर है. प्राय: हर भारतीय की थाली में अनिवार्य रूप से रहने वाली यह वस्तु ही मंहगी हो जाये तो इसके बाद तो कुछ कहना ही क्या? प्याज का यही हाल है. सेवा कर के नाम से वसूल होने वाली राशि हर आदमी के लिये मुसीबत बनी हुई है. प्राय: राज्य सरकारों ने इसे अपनी कमाई का जरिया बना रखा है. एक सामान्य परिवार को क्या-क्या करना पड़ता है?-परिवार का स्वास्थ्य,परिवार की परवरिश जिसमें उसकी रसोई, बच्चों की पढ़ाई, उनकी फीस , कपड़े, हास्टल फीस,टेलीफोन किराया,और न जाने क्या-क्या? इसके अलावा घर की भारी बढ़ी हुई बिजली, नगर निगम का संपत्ति कर,जल कर, सफाई कर और अन्य कई अघोषित कर. प्राय: हर घर में गैस,पेट्रोल डीजल से चलने वाले वाहन की सुविधा है. पेट्रोल डीजल के भाव में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आई कमी ने कुछ राहत जरूर दी है लेकिन अगर यह भी नहीं होता तो? हमारी स्थिति कर्ज में पैदा होने और कर्ज में मरने वाली पुरानी कहावत पर आज भी विद्यमान है. इस दौर में भगवान किसी को बीमार न करें अगर बीमार हुआ तो समझ लीजिये सारे परिवार पर मुसीबत आ गई क्योंकि अस्पताल में भरती होते ही अस्पताल के बिल को सुनकर उनकी आधी मौत हो चुकी होती है. 

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उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
यहां करीब तीन दर्जन उद्योग ऐसे हैं जो चौबीसों घंटे धूल भरी आंधी उगल रहे हैंं ,जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं ह्रै. नियंत्रण है तो भी वह कुछ दिनों में छूटकर आसमान और धरती दोनों पर कब्जा कर लेते हैं.
चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग कालिख पुतवा लेत…

ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …