सोमवार, 5 अक्तूबर 2015

रक्त ऐसे बह रहा जैसे नदी बह रही हो, किस-किस पर रोयें?


 रक्त ऐसे बह रहा जैसे
 नदी बह रही हो,
 किस-किस पर रोयें?

 मांस खाने वाले प्राणी का पूरा जीवन ही मारकाट से भरा रहता है, किसी निर्जीव की हत्या करते समय उसे जरा भी  ज्ञान नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है, उसे सिर्फ चिंता रहती है कि अपना पेट कैसे भरा जाये? जन्मजात मांसभक्षी होने से उसे इस बात की चिंता नहीं कि कौन कैसा है और उसके मरने से उसे क्या मिलने वाला ? लेकिन क्या मनुष्य भी जंगली जानवरों की तरह है?-उसे तो बनाने वाले ने इतनी सोचने की शक्ति दी है कि वह अच्छा बुरा क्या है बखूबी समझ सकता है. वह क्यों जानवरों की तरह हरकत करता है-मानते हैं कुछ लोगों को जानवरों का मांस खाने की जन्मजात आदत है किन्तु ऐसा भी तो मत करों कि उस प्राणी का अस्तित्व ही इस संसार से मिट जाये! अपने स्वार्थ और अपनी खुशी के लिये मनुष्य ने जानवरों का तो वध किया है और उनके अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया मगर अब वह इसे लेकर या अन्य दूसरे बहानों के बल पर अपने ही जैसे और अपने खून का भी वध करने पर उतर आया है. कहीं कोई कुछ बहाना बनाता है तो कहीं कुछ. विश्व  का एक पूरा भाग आतंकवाद के उन्माद में डूबा है तो दूसरी तरफ जहां शांतिपूर्ण सब चल रहा है वहां जहर घोलकर एक दूसरे का खून करने और खून के लिये उकसाने में लगे हैं. जंगल कानून क्या शहर में चल सकता हैं? मनुष्य का बर्ताव भी अगर जानवरों की तरह होने लगे तो इसे कौन रोके? हाल की कुछ घटनाओं ने सारी सोच को ही बदल दिया है.कोई विश्वविद्यालय में तो कोई सड़क पर तो कोई मंच पर कुछ भी कह रहा है -मैं यह कर लूंगा तो तुम मेरा क्या बिगाड़ लोगे? कोई पढ़ा लिखा और जिम्मेदार व्यक्ति समाज को अपना असली चेहरा दिखाते हुए बक रहा है कि मैंने अभी-अभी फलाना मांस खाया है-आओ मुझे मार डालों. ऐसी -ऐसी बाते करने की स्वतंत्रता क्या हमारे संविधान में दी हुई है? जब कोई जिम्मेदार लोगों का समूह आस्था स्थल पर एकत्रित होता है तो उसका ध्यान सिर्फ और सिर्फ उस परमात्मा की ओर होना चाहिये जिसने उसे बनाया है लेकिन क्या ऐसा हो रहा है? खून खराबे और हिंसा की बातें आस्था के पवित्र स्थल से क्यों उठ रही है? जाति,धर्म और संप्रदाय के नाम पर क्यों समाज एक दूसरे के खून का प्यासा हो गया? जब हम दूसरे धर्म मानने वालों से सिर्फ़ इसलिए संपर्क ना रखें कि कहीं बाक़ी लोग बुरा न मान जाएं तो उसके बाद हमारा मन और दिमाग़ उन्हीं बाक़ी लोगों का ग़ुलाम बनता चला जाता है.और हमें पता भी नहीं चलता कि हमारी आत्मा और नजऱ का रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में चला गया? मेरा एक मित्र बताता है एक दिन जब वो एक किराना दुुकान से सिंवई खरीद रहा था तो वहां खड़े एक व्यक्ति ने हैरानी से पूछा कि आप भी सिंवई खाते हैं. मैं तो समझता था कि सिवंई बस एक वर्ग विशेष खाता हैं. वाह भई वाह क्या मानसिकता है हमारी? किसी के कहने पर किसी की जान लेने का काम तब शुरू होता है जब किसी के मुंह पर पहला चांटा पड़े और आसपास के लोग इस व्यक्ति की हिमायत इसलिए ना करें क्योंकि उसकी नस्ल, धर्म और संस्कृति अलग है. चूंकि इस बुनियाद पर पहली बार थप्पड़ मारने का हौसला और बढ़ जाता है, फिर यह हौसला बढ़ते-बढ़ते अगली वारदात में दो चांटों और फिर एक चाक़ू और फिर एक पिस्तौल और फिर भीड़ के हमले और फिर पूरी बस्ती फूंक देने में बदल जाता है. हम खुद को यही कहते रह जाते हैं कि इतने बड़े देश में अब किस-किस घटना पर रोएं. यही छोटी-छोटी बातें समाज की माला में पिरोते-पिरोते इतनी बड़ी हार बन जाती हैं जिससे पूरे समाज को फांसी दी जा सकती है. जिसके हाथ में यह रस्सा है, अगर वो इससे हम सबको फांसी ना दे तो यह हमारी कोई अच्छाई नहीं, उसकी मेहरबानी है.