रविवार, 4 अक्तूबर 2015

और अब हूँन ने भी लिख डाली पुस्तक


...और अब हून ने भी लिख डाली
पुस्तक-ऐसा दावा किया
कि सब सोचने हुए मजबूर!

रिटायर होनेे के बाद प्राय: कुछ लोगों को पुस्तक लिखने का शौक आ जाता है लिखवाने और छपवाने दोनों के लिये उनके पास लोगों की कोई कमी नहीं रहती और वे उसका भरपूर फायदा भी उठाते हैं. यूं तो उनकी आत्मकथा से किसी  को कोई लेना देना नहीं होता लेकिन जब ऐसे लोग किसी स्वर्गीय प्रसिद्व लोगों का नाम और उनके जीवन में घटित घटनाचक्र का खुलासा करते हैं तो स्वयं तो चर्चा में आ जाते हैं दूसरों को भी खुलकर बोलने का मौका देते हैं. अब कोई मृत व्यक्ति अपना स्पष्टीकरण देने आनेे वाला तो नहीं तो फिर क्यों न ऐसी कुछ बातों की कल्पना की जाये जो 'शायदÓ की श्रेणी में आती हो.  हाल के वर्षों में जीवनी लिखने वालों की बाढ़ सी आ गई है. इनमें से उस समय के लोग भी हैं जो स्व.जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के जीते जी उनके खिलाफ मुंह खोलने की भी हिमाकत नहीं करत थेे. जहां तक नेताजी सुभाषचंद बोस की जीवनी का सवाल है उनकी मृत्यु को लेकर बहुत सी भ्रांतियां है यह बाते आज भी सामने आये तो बात समझ में आती है लेकिन इंदिरा और नेहरू के समय के लोग तो अब भी जीवित हैं वे जानते हैं कि इन दोनों ने देश को कैसे चलाया. उनपर अपनी आत्मकथा में जिक्र करने वाले सिर्फ अपनी पुस्तक को चर्चित बनाने और इसे भारी संख्या में बिकवाने के अलावा कोई खास मकसद लेकर पुस्तक लेकर आते प्रतीत नहीं होते. अभी एक रिटायर्ड आर्मी अफसर ने फिर पुस्तक लिख डाली है जिसमें दावा किया गया है कि आर्मी ने राजीव गांधी सरकार का तख्तापलट की साजिश की थी, इससे पूर्व एक अन्य पुस्तक में दावा किया गया था कि आर्मी ने और कई कारनामे किए थे लेकिन यह समझ में नहीं

आता कि ऐसा था तो लोग उस समय ऐसे महत्वपूर्ण ओहदे पर बैठे रहने के बाद भी इसका रहस्योद्घाटन करने से क्यों डरते थे. बुढ़ापे में आकर बताकर वे समाज को क्या मेसेज देना चाहते हैं ? वेस्टर्न कमांड में कभी तैनात रहने वाले ले.जनरल पीएन हून का दावा है कि 1987 में राजीव गांधी सरकार के तख्ता
पलट की साजिश रची गई थी. हून वेस्टर्न कमांड में पोस्टेड रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि पैरा-कमांडोज की तीन बटालियंस जिसमें एक वेस्टर्न कमांड की भी थी, उन्हें एक्शन के लिए दिल्ली जाने को कहा गया था. हून ने यह दावा अपनी किताब द अंटोल्ड ट्रूथ में किया है. दिलचस्प तथ्य तो यह है कि देश में सेना का विभाजन जिस ढंग से हुआ है उस परिस्थिति में क्या देश में किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता पलटा जा सकता है. यहां राष्ट्रपति के अधीन सेना के तीन अंग- जल, वायु ,और थल हैं तथा तीनों अंगों के अपने अलग-अलग जनरल, वायुसेना, थल  और जल सेना अध्यक्ष हैं तब क्या यह संभव है कि इस देश में सिर्फ तीन बटालियन लेकर कोई क्रांति की जाये? जब तक तीनों एक अंग एक नहीं होंगे तब तक देश में तख्ता पलट जैसी बात सोची भी नहीं जा सकती? फिर क्या हून जैसा कह रहे हैं यह सिर्फ उस बटालियन से संभव है? ऐसी बहुत सी बाते हैं जो ऐसी पुस्तक लिखकर लोगों के बीच चर्चा में आने का प्रयास करते हंै. 86 साल के हून का दावा  हैं कि जब वे आर्मी में थे तब आर्मी चीफ जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी और ले.जनरल एसएफ रोड्रिगेउस (वाइस चीफ ऑफ आर्मी) तख्ता पलट करने की प्लानिंग में शामिल थे। किताब में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि उस वक्त तख्ता पलट के लिए उन नेताओं की मदद लेने की प्लानिंग थी जिनसे राजीव गांधी के संबंध अच्छे नहीं थे बहरहाल हून की बातों का अब विश्लेषण होगा और खूब चर्चा भी होगी.