शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2015

मुद्दे की बात को किनारे कर फिजूल की बातों पर यह कैसा शोर?



कांग्रेस के कुशासन से त्रस्त जनता ने बड़ी उम्मीदों के साथ नई सरकार बनाने की भूमिका निभाई थी? क्या वह जनता के विश्वास पर खरा उतर रही है? वास्तविकता कुछ यही कह रही है कि जनता को दिये वायदे सब खोखले निकल रहे हैं और सरकार जनता को किये गये वायदों से पीछे हट गई है, सरकार ने जो सपने दिखाये थे वह कोरी कल्पना बनकर रह गये हैं.सरकार स्वयं  आइने के सामने आये तो उसे सारी चीजे साफ दिखाई देगी कि वह अपने  वायदों से कितनी दूर चली गई है. देश में नाराजगी और अस्तिरता का माहौल निर्मित हो रहा है.विपक्ष तो अपना काम इस मामले में हवा देने का कर ही रहा है किन्तु सरकार के अपने लोगों की तरफ से भी जो बाते हो रही है वह समाज को एक गलत संदेश दे रही है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बड़े मुद्दों पर देर तक चुप रहते हैं तब तक पानी सर से उतर चुका होता है.देश को इस समय मन की बात नहीं दिल से दिल मिलाने की जरूरत है-सहित्यकार, फिल्मकार, वैज्ञानिक नाराज हैं, भले ही सरकार इसे गंभीरता से नहीं ले रही किन्तु इसे अनदेखा भी तो नहीं किया जा सकता .एक आक्रोश तो आम जनता में भी है- मंहगाई, भ्रष्टाचार तथा कथित अव्यवस्था से लोग परेशान हैं.कभी किसी मुद्दे को लेकर बहस छिड़ती है तो कभी किसी बेतुके बयानों पर हंगामा खड़ा होता है ऐसा लगने लगता है कि कानून की पकड़ कहीं नहीं है. इधर महंगाई का आलम यह है कि आम आदमी के लिये रसोई एक समस्या बन गई है.शिक्षा,रोजगार स्वास्थ्य सब बेईमानी साबित हो रही है खाने की चीजों के दाम आम आदमी की पकड़ से बाहर है- प्याज के दाम से शुरू हुईमंहगाई दाल तक पहुंच चुकी है और आने वाले समय में यही हाल रहा तो  और भी कई वस्तुओं को अपनी लपेटे में ले लें तो आश्चर्य नहीं.दाल दो सौ रूपये की रिकार्ड बिक्री पर चल रहा है जमाखोर पूरा फायदा उठा रहे हैं जबकि बाजार पर से सरकार की पकड़ एकदम कमजोर होती दिख रही है.विकास के नाम पर जहां सरकार ने रेलवे में मालभाड़े से लेकर यात्री किराये तक में भारी वृद्वि की है वहीं सर्विस टैक्स और ऐसे अनेक टैक्सों में बढ़ौत्तरी कर जनता को बेकफुट पर लाकर खड़ा कर दिया है. एक  के बाद एक उपभोक्ता सेवाओं की फीस में बढ़ौत्तरी ने आम आदमी को तो कहीं खड़े रहने लायक ही नहीं छोड़ा है.कभी बिजली की दरों में वृद्वि तो कभी संपत्ति कर में बढ़ौत्तरी और कभी सफाई के नाम पर करों का बोझ एकदम समझ के परे वाली बात हो गई है.सबसे दिलचस्प बात तो यह कि अपनी असफलताओं को छिपाने का खेल भी बड़े स्तर पर जारी है इस बीच सवाल यह उठ रहा है कि जमाखोर और भ्रष्टाचारियों के पास एकत्रित धन को क्यों नहीं पब्लिक किया जा रहा? जमाखोरों से जब्त सामग्री को तत्काल बाजार में उतारा जाये. भ्रष्ट अफसरों और कालाबाजारियों से पांच-पांच दस-दस हजार करोड़ रूपये अगर जब्त किये जा रहे हैं तो उसे पब्लिक का टैक्स बोझ कम करने के लिये क्यों नहीं उतारा जा रहा?