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डेढ़ सौ साल पहले बना लाउड़स्पीकर अब इंसान का दुश्मन बना!


लाउडस्पीकर की आवाज से लोगों को इतनी नफरत हो गई है कि जोर से बोलने वालों को भी अब लोग लाउडस्पीकर का नाम देने लगे हैं. आज की दुनिया में लोग लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध नहीं चाहते बल्कि इसके  उत्पादन पर ही प्रतिबंध चाहते हैं.यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने आस्था स्थलों पर लाउडस्पीकरों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने से मना किया है लेकिन लोगों को तो समझना चाहिये कि यह आम लोगों के लिये कितना अनुपयोगी व हानिकारक है. अब तो लाउडस्पीकर लोगों की जान के दुश्मन बनने लगे हैं.ऐसे में क्या लाउडस्पीकर का उपयोग जारी रखना उचित है? आस्था केन्द्रो में सदैव शाङ्क्षत होनी चाहिये चूंकि यह उस परमात्मा का वासस्थल है जिसने दुनिया को बनाया है अगर वहीं आप अशांति फैलाओगे तो फिर इसका मतलब तो यही है कि आपको उन्हीं पर विश्वास नहीं है, बहरहाल आज हालात यह हो गये हैं कि लाउडस्पीकर आज नफरत फैलाने का भी एक जरिया बन गया है. हर पांचवी हिंसा की घटना नफरत की लाउडस्पीकर से निकल रही है. अब देश में लाउडस्पीकर का बड़ा भाई डीजे भी सड़क पर उतर आया है जो लोगों की धड़कनों पर सीधा प्रहार करता है कई लोगों की धड़कने इसकी आवाज से बंद हो जाती है. देश की राजधानी दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा के जारचा इलाके के बिसेड़ा गांव में हुई सांप्रदायिक घटना की जड़ में एक लाउडस्पीकर है, जिससे हुई घोषणा के बाद भीड़ ने एक शख्स की पीट-पीटकर हत्या कर दी. इसी लाउडस्पीकर से घोषणा की गई कि गांव के एक मुस्लिम परिवार के घर में कुछ अनर्थ हो रहा है. पिछले साल यूपी में जितनी भी सांप्रदायिक हिंसा हुई, उसमें हर पांचवी हिंसा की घटना नफरत की लाउडस्पीकर से निकली है. लाउडस्पीकर का उपयोग करते समय लोग सारी गाइडलाइन को बलाये ताक रख देते हैं. गाइडलाइंस है कि कब और कहां लाउडस्पीकर बजाएं और किस स्तर तक कितनी ऊंची  या नीची आवाज में बजाएं. लेकिन कोई इसका न पालन करता है न प्रशासन कभी ये संज्ञान लेता है कि उनके  आदेश का पालन हो रहा है या नहीं. कुछ स्थानों पर तो लोग सोये रहते हैं लेकिन टेप लगाकर लाडडस्पीकर को तेज आवाज में चालू करके चले जाते हैं. 19वीं सदी में लाउडस्पीकर बनाने वाले जॉन फिलिप रेइस ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि 150 साल बाद एक विकसित समाज में यही भोंपू बेगुनाहों की जान का दुश्मन बन जायेगा. एक अनुमान के मुताबिक 2014 के अगस्त महीने तक अकेले यूपी में पुलिस ने सांप्रदायिक हिंसा के 600 मामले दर्ज किए. उनमें हर पांचवा मामला लाउडस्पीकर से फैलाए उन्माद का अंजाम था. करीब 120 मामले लाउडस्पीकर पर नफरत की गूंज से निकले.बावजूद इसके प्राय: हर आस्था केन्द्रो में  लाउडस्पीकर बजते ही रहते हैं. इनसे ना सिर्फ ध्वनि प्रदूषण फैलता है, बल्कि उससे कहीं ज्यादा छात्रों की पढ़ाई को नुकसान व लोगों के सुनने में फरक व नफरत का जहर फैलता है. ध्वनि प्रदूषण रेगुलेशन रुल्स के मुताबिक प्रशासन की लिखित इजाजत के बाद ही कहीं पर लाउडस्पीकर लगाया जा सकता है. रिहायशी इलाकों में लाउडस्पीकर की आवाज की सीमा दिन में 55 डेसिबल है, जबकि रात में 45 डेसिबल लेकिन इस नियम का पालन तभी होता है  जब कोई वीआईपी या वीवीपी इसकी शिकायत करता है.




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