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राजनीति की बिगड़ी लगाम को थामने एनजेएसी के विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट का फैसला!


 विवादित बयानों, भ्रष्ट राजनीति, भ्रष्टाचार तथा आपराधिक तत्वों के बढ़ते हौसले और उनको प्राप्त राजनीतिक संरक्षण के तहत हमारी वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वरूप क्या होगा यह हम नहीं कह सकते लेकिन जो राजनीतिक  माहौल आज दिखाई दे रहा है वह यही संकेत दे रहा है कि कुछ अच्छा नहीं चल रहा. आजादी के बाद से अब तक के वर्षों में तो कम से कम ऐसा कभी नहीं हुआ जो अब हो रहा है. मुंहफ ट और कुछ भी बोलकर विवाद पैदा कर देश की एकता अखंडता और संप्रभुता को खतरे में डालने की प्रवृति हम सबकों सोचने के लिये विवश कर रही है कि हमारा रास्ता कितना कठिन होता जा रहा है. इस संदर्भ में भारत के उपराष्ट्रपति अब्दुल हामिद अंसारी का रायपुर में दिया गया वह बयान भी महत्वपूर्ण है जिसमें उन्होने कहा है कि 'हमें हमारे राजनीतिक, सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के संवैधानिक तरीकों पर कायम रहना है तथा अपनी स्वतंत्रता का समर्पण किसी महान् व्यक्ति के कहने पर भी नहीं करना है. जिससे वह हमारी संस्थाओं को ही नष्ट करने लगेÓ. अगर हम देश के संविधान की बात करें तो उसे बनाने वालों ने हर व्यक्ति को आजादी कुछ हद से ज्यादा प्रदान की है, यह होना भी चाहिये लेकिन जब लोग इसका दुरूपयोग करने लगे तो उसपर तो लगाम लगनी ही चाहिये मगर ऐसा भी नहीं हो रहा. इस बात को सुप्रीम कोर्ट ने महसूस किया है.एनजेएसी पर उसके फैसले ने भले ही राजनीतिज्ञों को चौका दिया हो लेकिन हम समझते हैं यह एक सही फैसला है भले ही भारत के वित्त मंत्री और प्रमुख अधिवक्ता अरूण जेठली इसे लोकतंत्र की मूल भावना को नजर अंदाज करने की बात कह रहे हो.वे यह भी कह रहे हैं कि लोकतंत्र में अन इलेक्टेड अर्थात गैर चुने हुए की निरंकुशता नहीं चल सकती. एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे व्यक्ति को इस तरह का निर्णय बुरा लगना स्वाभाविक है लेकिन भारत में विश्वास,उम्मीद और न्याय के लिये जो एक ही व्यवस्था अब तक बची है वह है देश की न्यायपालिका-वह अगर यह समझती है कि उसके अपने लोगों की नियुक्ति में उसकी ही मर्जी चलनीे चाहिये तो उसमें किसी को आड़े नहीं आना चाहिये चूंकि उसे भी शायद यह महसूस हुआ है कि जिस तंत्र के जरिये उसके लिये लोगों को चुना जायेगा उसमें भी भ्रष्टाचार की बू लग सकती है. शायद इसी लिये कोर्ट ने सरकार के इस निर्णय को मान्य नहीं किया जो सीधे-सीधे इंगित कर रहा है कि वह किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप को बर्दाश्त कर न्याय नहीं कर सकती.जजों के मन में जब राजनेताओं के प्रति आभार का मन भर जायेगा तो क्या वे उन्हीं के होकर नहीं रह जायेंगे? हम समझते हैं कि इसी को मद्देनजर रखते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला लिया गया है जिसने पूरे राजनीतिक हल्के में सनसनी फैला दी है.यह भी जरूरी है कि न्यायपालिका की तरह अलग-अलग क्षेत्रों में विशेषज्ञों की नियुक्ति का कार्य भी उन्हीं पर छोडऩा चाहिये चूंकि जो जिसमें माहिर हो वह ही दूसरों की पहचान कर सकता है. लोकतंत्र मजबूत हो यह कौन नहीं चाहता. देश की जनता आजादी के पहले और आजादी के बाद दोनों का दौर देख चुकी है. लोकतंत्र से तानाशाही का एक रूप इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गये आपात काल का दौर था जिसे भी लोग देख चुके हैं लेकिन अब जब ढीली डोर छोड़ दी गई है तो कम से कम व्यवस्थापिका को न्यायपालिका पर हावी होने का मौका नहीं देना चाहिये शायद इसे न्यायपालिका ने महसूस किया है. जिस तरह से लोकतंत्र में बयानबाजी और आपराधिक तत्वों के हावी होने का सिलसिला शुरू हुआ है उस संदर्भ में भी अब यह संभावना बढ़ गई है कि भविष्य में भारत का सर्वोच्च न्यायालय जिसपर सबकी आशा टिकी हुई है और भी कुछ अन्य मुद्दों पर संज्ञान ले जिसमें महिलाओं, बच्चों पर होने वाले अत्याचार, यौन शोषण,अपराध का बढ़ता ग्राफ,अवसरवादी वोट बैंक तथा राजनीति की बिगड़ी लगाम शामिल है.

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ऊँची दुकान फीके पक वान!
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