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करोड़ों का एम्स क्या अंचल की आशाओं,आकाक्षांओं पर खरा उतर रहा! यहां क्या हो रहा है?



करोड़ों रूपये खर्च कर रायपुर में बनाया गया अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान  संस्थान 'एम्सÓ क्या छत्तीसगढ़ के लोगों की आशाओं के अनुरूप खरा उतर रहा है? या आंतरिक गुटबाजी, अव्यवस्था और अनुशासनहीनता जैसी बुराइयों में फंसता जा रहा है? एक सौ बीस एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैले इस ख्याति प्राप्त अस्पताल का विवाद शुरू से इसके साथ रहा है. एम्स बनाने की घोषणा के बाद कई वर्षों तक न इसके लिये बजट स्वीकृत किया गया और न ही कोई संज्ञान लिया गया. ले देकर कार्य शुरू हुआ तो फंड का रोना रोते हुए कई बार निर्माण कार्य में विलंब हुआ और कोई न कोई अड़ंगा आता रहा. आखिर दो साल पहले इसका उद्घाटन हुआ तो बस कुछ ही तरह की चिकित्साएं यहां सुलभ हुई. अब तो आलम यह है कि अस्पताल बनाने वाली कंपनी आगे का निर्माण कार्य बीच में ही छोड़कर चली गई. बताया जा रहा है कि कंपनी का पेमेन्ट नहीं दिया गया है ऐसे में उसके लिये आगे का काम जारी रखना मुश्किल है वह अपना बोरिया बिस्तर बांधकर रायपुर से चला गया. स्थानीय अस्पताल प्रबंधन का यद्यपि इस मामले में हस्तक्षेप नहीं है लेकिन कंपनी द्वारा फिनिश्ंिाग कार्य व अन्य जो कार्य उसे करना था उसे बीच में छोडऩे से जो परेशानी अब यहां के मरीजों व स्थानीय प्रबंधन को झेलना पड़ेगा वह अलग. अस्पताल को बाहर से देखो तो यहां सुनसानियत ही नजर आती है जबकि अंदर पूरे छत्तीसगढ़ के लोग लाइन लगाये न केवल अपने नम्बर का इंतजार करते खड़े रहते है बल्कि ईश्वर से दुआ, चिकित्सकों पर भरोसा और आशा की उम्मीदें लगाये नजर आते हैं किन्तु क्या वास्तव में ऐसा है कि अस्पताल बनने के बाद से जैसी सुविधा और स्वास्थ्य लाभ की आशा की गई थी वह लोगों को उपलब्ध हो रही है? एम्स का अपना
कालेज शुरू हो गया है उसमें छात्र अध्ययनरत हैं तथा नर्सिगं कालेज भी चल रहा है. यहां सबसे बड़ी दिक्कत यहां सुविधाओं को विकसित करने के काम में देरी है जिसका खामियाजा इस अंचल व आसपास के मरीजों को भुगतना पड़ रहा है.  दूसरी ओर  दिल्ली तथा अन्य राज्यों में पहले से मौजूद एम्स की सुविधाएं इस एम्स को अब तक नहीं दी गई वहीं कतिपय चिकित्सकों के बीच पटरी भी नहीं बैठ रही. अभी कुछ दिन पहले यहां एनाटामी  विभाग के एक पुस्तक प्रकाशन को लेकर डाक्टरों के बीच हुआ विवाद सुर्खियों में है. वरिष्ठ चिकित्सकों में इस मुद्दे को लेकर मारपीट तक की नौबत आ गई.यहां सीनियर और जूनियर का झगड़ा भी चर्चा में है-दोनों पक्षो का अलग अलग साम्राज्य है और इसमें किसी का दखल बड़ा विवाद का कारण बन जाता है.एनाटामी की पुस्तक प्रकाशन को लेकर अस्पताल की पहली मंजिल पर गरमागरम बहस,धक्का मुक्की और मारपीट की नौबत को चटखारे लेकर लोग एक दूसरे को सुनाते हैैं.

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काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
यहां करीब तीन दर्जन उद्योग ऐसे हैं जो चौबीसों घंटे धूल भरी आंधी उगल रहे हैंं ,जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं ह्रै. नियंत्रण है तो भी वह कुछ दिनों में छूटकर आसमान और धरती दोनों पर कब्जा कर लेते हैं.
चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग कालिख पुतवा लेत…

ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …