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सिर्फ गैस ही नहीं कई तरह की चिंगारी सड़कों पर सुलग रही है!




हादसे होते हैं, तब जागता है प्रशासन, उससे पहले तक उसे होश नहीं रहता कि जो हो रहा है वह खतरनाक व जानलेवा है.गैस के गोदाम, पटाखे की दुकान,पेट्रोल पंप, मिट्टी तेल की दुकान यह सब प्राय: विकसित शहरों के बीच में हैं चूंकि विकास के साथ आबादी बढ़ी और घनी बस्ती, कालोनियां बेतरतीब ढंग से विकसित हुई. ऐसा प्रशासन के लोगों की नाक के नीचे होता रहा किन्तु किसी को भी इतनी फुरसत नहीं रहती कि वे शहरों में निर्माण होतेे वक्त देखे कि इससे क्या रिफरकेशन हो सकते हैं. ट्रेन दुर्घटना होने के बाद उसके कारणों का पता लगाया जाता है-ट्रेन दुर्घटना न हो इसका प्रबंध शुरू से नहीं किया जाता. सांप मर जाये तो लोग लकीर को पीटते रहते हैं. झाबुआ हादसे ने देश को हिलाकर रख दिया. यहां गैस का गोदाम फटा तो पूरा देश हिल गया. क्या वहां के प्रशासन और हमारे छत्तीसगढ़ के प्रशासन में बैठे लोगों को मालूम नहीं था कि घनी बस्तियों में गैस के गोदाम खतरनाक है? क्या उन्हें मालूम नहीं कि शहर के भीतर पटाखा दुकाने चलाना और पेट्रोल-डीजल के पंप खतरनाक हो सकते हैं? फिर प्राथमिक तौर पर ऐसे प्रबंध क्यों नहीं किये जाते कि आम आदमी की जिंदगी से खिलवाड़ न हो. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर विकसित होने के साथ यहां विकास तेजी से और बेढंग तरीके से हुआ. बस्तियां,कालोनी और शहर  बसते गये किन्तु यह सब प्रशासन में बैठे लोग देखते रहे- शहर के अंदर करीब पैंतीस गैस गोदाम काम कर रहे हैं क्या कभी प्रशासन ने जानने की कोशिश की यह शहर में भारी विस्फोट का काम कर सकता है? -अब झाबुआ मध्यप्रदेश में हादसा होने के बाद याद आ रहा है कि यहां भी तो आम आदमी सुरक्षित नहीं है. क्यों नहीं ऐसे प्रबंध किये गये कि इन सभी को शहर से दूर ट्रासंपोर्ट नगर, थोक बाजार, डेयरी आदि की तरह सुरक्षित जगह पर बसाया जाये.सरकार ने नगर निगम, विकास प्राधिकरण, ग्रामीण निवेश विभाग, पर्यावरण विभाग, पीडब्लूडी, गृह-निर्माण मंडल और न जाने कितने ऐसे विभागों का गठन कर रखा है जिसपर जनता की जेब से निकला पैसा खर्च होता है इसमें तैनात मोटी तनख्वाह प्राप्त करने वालों के सिर पर यह जिम्मेदारी थोपकर क्यों एक्शन नहीं लिया जाता? अब भी समय है शहर के व्यवस्थित बसाहट के लिये.जिस तरह गुढिय़ारी थोक बाजार को शहर से बाहर बसाया गया है उसी प्रकार अन्य व्यावसायिक स्थलों के लिये अलग से व्यवस्था की जाये. शहर में विस्फोटक ही नहीं सड़कों पर ठेले में नाश्ता बेचने वाले तक भीड़ एकत्रित कर सड़क में हादसों को आमंत्रित कर रहे हैं. जब सरकारी तौर पर गैस गोदामों को व्यवस्थित करने का बीड़ा उठा लिया गया है तो उसे इस दिशा में भी अब कड़ाई बरतने की जरूरत है कि शहर के प्रमुख मार्गों पर ठेले से व्यापार न चले उसके लिये भी जगह निश्चित हो. इससे पहले डेयरी चलाने वाले, पटाखे और पेट्रोल पंप वालों के लिये भी एसे स्थलों की व्यवस्था की जानी जरूरी है जो आम लोगों के लिये सुरक्षित हो.

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