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अपराध अन्वेषण में मीडिया का दखल, अपराधों की गुत्थियां सुलझाने में रोड़ा!



किसी व्यक्ति को हिरासत में लेना और गिरफ्तार करना दोनों अलग-अलग है -यह बात मुझे उस समय पता चली जब एक आपराधिक मामले की रिपोर्ट के बाद कोर्ट से समन पहुंचा. असल में कथित अपराधी को हिरासत में लिया गया था न कि उसे विभिन्न धाराओं में गिरफ्तार किया गया था. कई बार होता यह है कि पुलिस अपने तरीके से किसी को यूं ही पूछताछ के लिये बुलाती है और बाद में या तो छोड़ दिया जाता है या फिर गिरफ्तारी शो कर दी जाती है लेकिन कतिपय हाई-प्रोफाइल मामलों में पहले हिरासत और फिर गिरफ्तारी शो की जाती है. कानूनी दृष्टि से हिरासत और गिरफ्तारी अलग-अलग बात है इसलिये उसे छापते समय भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है वरना कभी-कभी रिपोर्टिंग का हमारा उत्साह कानून ठंडा कर सकता है, बहरहाल हम आज इस बात का जिक्र कुछ विशेष परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में कर रहे हैं- अपराध और अपराध की रिपोर्टिंग में आये भारी बदलाव ने सबको चौंका दिया है. कुछ रिपोर्टिंग प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया दोनों में ऐसी हो रही है जो पुलिस को मदद मिलने की जगह सीधे-सीधे अपराधियों को लाभ पहुंचाने का काम कर रही है. मुम्बई 26/11 आतंकी हमला हो चाहे गुरूदासुपर की घटना अथवा जम्मू-कश्मीर की-प्रिंट मीडिया की भूमिका अपने कर्तव्य की दृष्टि से जरूर सही हो सकती है लेकिन अगर सही ढंग से विश्लेषण कर देखा जाये तो इसका फायदा सीधे-सीधे अपराधियों को ही होता है. जम्मू-कश्मीर में आंतकवादी हमले के सीधे दृश्यांकन के बाद तो सरकार को स्वयं संज्ञान लेकर दृश्यांकन रूकवाना पड़ा. हम कभी-कभी अति उत्साह में आकर या अपना टीआरपी बढ़ाने के लिये ऐसी-ऐसी बातें दिखा या लिख देते हैं जो सीधे-सीधे संबंधित अपराधी को भाग निकलने या अगली  ब्यूहरचना तैयार करने में मदद करता है. हाल के दिनों में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बड़ी डकैती हुई, अपराधी अपराध कर भाग गये, उसके बाद जो रिपोर्टिंग इस मामले में कुछ मीडिया में हुई वह अपराधियों को सीधे-सीधे मदद पहुंचाने वाली थी. उदाहरणार्थ- वे कहां भागे हैं, कैसे भागे, कहां-कहां पुलिस उनका पीछा कर रही है, कौन लोग हो सकते हैं? डकैती में कोई पकड़ा नहीं गया उसके पहले ही डिसाइड कर लिया गया कि वह पारधी गिरोह हो सकता है. ऐसी सब बातें या तो कुछ हमारे लोग खुद अपने मन से बनाते हैं या जांच करने वालों में से कुछ लोगों के मुंह से निकलता है. अकेले यह इस डकैती का मामला नहीं इससे पूर्व कई ऐसी घटनाएं हुई जिसमें इस तरह की मीडिया रिपोर्ट ने पुलिस के अन्वेषण को बाधक बनाया है. नन बलात्कार कांड का आज तक खुलासा नहीं हुआ- इस कांड में पीछे मुड़कर देखें-क्या क्या खुलासे हुए थे. आरूषी हत्याकांड की हकीकत कुछ निकली और कुछ कही गई. अब यह जरूरी हो गया कि जो बातें कही या लिखी जाय उसके लिये किसी एक व्यक्ति को अधिकृत किया जाये. यह बात और है कि रिपोर्टर अपनी इन्वेस्टीगेटिंग कर अपनी रिपोर्ट दे, मगर यह कहा जाना कि अपराधी को पकडऩे पुलिस फलां जगह के लिये रवाना हो गई है और एक टीम वहां जायेगी तो दूसरी वहां तो इससे तो यही होगा कि अपराधी पूरी तरह सचेत हो जायेगा. आज संचार साधन इतने हाईटेक हो गये हैं कि हर व्यक्ति इसका भरपूर उपयोग कर रहा है. मुम्बई में शीना मर्डर केस में जांच प्रमुख रूप से पुलिस कमीश्नर राकेश मारिया स्वयं कर रहे हैं. उन्होंने इस केस की गुत्थियों को सुलझाने में देरी के लिये मीडिया को जिम्मेदार ठहरा दिया है. कुछ बातें अतिउत्साह में ऐसी भी लिख या दिखाई जा रही है जिसका शायद अपराध या अपराधी से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है. काल्पनिक बातों पर होने वाली रिपोर्टिंग वास्तव में गड़बड़झाला ही है जो राकेश मारिया के उस कथन की पुष्टि करता है जिसके अनुसार मीडिया के भारी दखलअंदाजी ने गुत्थियों को बुरी तरह से उलझा दिया है तथा अन्वेषण के तथ्यों तक पहुंचने में देरी कर दी है.

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उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

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काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
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ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …