गुरुवार, 24 सितंबर 2015

सड़क से..लेकर बस,ट्रेेन और प्लेन तक मौत का पीछा...आखिर कौन है इन सबके लिये जिम्मेदार?



सबसे पहले राजधानी के छेरी-खेड़ी इलाके से लगी उस बुरी खबर का जिसमें तीन छात्रों की मौत हो गई. दो अन्य भी गंभीर रूप से घायल हुए हैं. राजधानी में फैशन डिजाइनिंग की पढ़ाई करने वाले 10 दोस्त बर्थडे मनाने दो कारों में सवार होकर नया रायपुर जा रहे थे. दोनों कारों के बीच रेस होने लगी, रेस के दौरान दोनों का बैलेंस बिगड़ा और आपस में टकरा गये. हादसे में  कार में सवार तीन छात्रों  की मौत हो गई जबकि दो युवक गंभीर रूप से घायल हैं. इस दर्दनाक हादसे में टाटीबंद रायपुर की  किरण पनेज सहित उसकी क्लास मेट अनिशा सरलिया व सिद्वार्थ अब इस दुनिया में नहीं रहे-सभी को हार्दिक श्रद्वांजलि.
रायपुर की खबर चौका देने वाली है जबकि हंसी खुशी परिवार को लेकर ट्रेन, बस या हवाई जहाज से सफर करने वालों की जिंदगी का भी अब कोई भरोसा नहीं रहा.कभी सपने में भी नहीं आता कि हम जिस सफर पर जा रहे हैं  यह हमारी आखिरी यात्रा हो सकती है, किन्तु हो जाती है. यह मौत कभी एक्सीडेंट के रूप में तो कभी डकैती, लूट, छेड़छाड़ या अन्य किसी तरह से होती है. प्लेन में सफर करने वाले चंद मिनटों या घंटो में अपने गंतव्य पर पहुंच गये तो ठीक वरना डर बना रहता है कि कभी प्लेन का इंजन खराब न हो जाये या फिर कोई अन्य दुर्घटना न घट जाये. आंतकियों के अपहरण का भी भय रहता है लेकिन बस और ट्रेन में सफर करने वाले तो आजकल पैसा देकर मौत या अपनी मुसीबत खरीदते हैं-यह हमारी मजबूरी और सरकार की लापरवाही है जिसके चलते यात्री मुसीबत में फंसते हैं विशेषकर ट्रेनों में सफर करने वालों के ऊपर मुसीबत किस रूप में आ जाये कोई नहीं जानता अब अलीपुरद्वार (पश्चिम बंगाल) के इस परिवार को ही देखिये अपने दस माह के बच्चे को लेकर हंसी खुशी यात्रा पर निकले थे किन्तु दीमा स्टेशन के पास इन्हे मुसीबतों ने घेर लिया और ट्रेन से बच्चे को लेकर कूदने मजबूर कर दिया. दंपत्ति और उनकी बच्ची को गंभीर चोटें आई हैं तथा वे अस्पताल में जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं. पश्चिम बंगाल पुलिस जो बखान कर रही है उसके अनुसार पत्नी के साथ ट्रेन में  पुरुषों के एक समूह द्वारा कथित तौर पर छेड़छाड़ और फिर बलात्कार की कोशिश किए जाने के बाद दंपत्ति को अपनी इज्जत बचाने के लिये बच्ची के साथ टे्रन से कूदना पड़ा. यह घटना महानंदा एक्सपे्रेस की है जिसमें 32 वर्षीय आशाबल और उसकी पत्नी (25) अपनी 10 माह की बेटी के साथ सफर कर रहे थे कूदने की वजह यह रही कि रात ट्रेन के जनरल डिब्बे में 10 से 12 शराबियों का समूह  घुस आया और उसने पत्नी के साथ छेडछाड़ शुरू कर दी. ऐसी घटनाओं के लिये आखिर कौन जिम्मेदार है. सब जानते हैं कि ऐसी घटनाएं लगातार हो रही  है फिर भी इन्हें रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया जाता? प्लेन में चढ़तेे वक्त यात्रियों का ऊपर से लेकर नीचे तक सारी चीजों की जांच होती है फिर ट्रेन को क्यों बख्शा जाता है? विशेषकर उन ट्रनों को जो लम्बी दूरी तक चलती है. सफर करने वाले अच्छी खासी रकम रेलवे को देते हैं फिर भी कोई गारंटी नहीं कि वे सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंच जायेंगे. यात्रियों की जेब से निकलने वाले पैसे से मोटे हो रहे टीटीआई आरपीएफ वाले कहां रहते हैं? यात्रियों के समक्ष टे्रन में घटित होने वाली प्राय: घटनाओं को मौन, आंख मीचकर सहन करने के अलावा कोई चारा नहीं रहता.? यात्रियों की इस मजबूरी का फायदा अपराधी तो उठाते ही हैं- रेल प्रशासन भी लापरवाह है. आम यात्रियों की सुरक्षा का कोई इंतजाम किसी भी गाड़ी में नहीं रहता. असल में सारी सुरक्षा यात्रियों के स्टेशन में
पहुंचते ही शुरू हो जाना चाहिये. हर ट्रेन में बंदूकधारी पुलिस के कम से कम दो से तीन जवानों की मौजूदगी किसी भी अनहोनी घटना को टाल सकती है लेकिन ऐसा कोई प्रबंध किसी भी ट्रेन में नहीं है. हर यात्री को टिकिट लेने के बाद भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है इसमें उसके सामान की चोरी हो सकती है.उसकी इज्जत लुट सकती है उसे धक्का देकर ट्रेन से बाहर फेक दिया जा सकता है या और भी कुछ. बेचारा यात्री वास्तव में हमारी भारतीय रेल का एक निरीह प्राणी है जो बेबस,मजबूर यात्रा कर अपने गंतव्य तक पहुंचता है पहुंच गया तो उसकी किस्मत वरना क्या? वह अपनी किस्मत पर रोने वाला अलीपुरद्वार के उन तीन मनुष्यों की तरह है जो आज जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं.