सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

क्या वीआईपी कल्चर आम आदमी के अधिकारों पर ठोकर नहीं मार रहा?



इस साल के शुरू में एक छोटी किन्तु महत्वपूर्ण खबर अखबारों में छपी, जो किसी अफ्रीकी राष्ट्र से संबन्धित थी जिसमें कहा गया कि-''एक व्यक्ति सड़क पर अपनी कार से जा रहा था, तभी उसे एक व्यक्ति ने हाथ दिखाकर लिफट देने को कहा-उसने कार रोकी, उसको कार में बिठाया और दोनो बात करते हुए गंतव्य की ओर निकल पड़े. रास्ते में अपना पड़ाव आते ही उस व्यक्ति ने गाड़ी मालिक से कहा गाड़ी रोक दो, मुझे यहीं उतरना है.गाडी रोकने के बाद चालक ने उस व्यक्ति से पूछा- भाईसहाब आप करते क्या हैं?-उसने बताया कि वह उस देश का राष्ट्रपति है.ÓÓ अब बताइये उस ड्रायवर पर क्या गुजरी होगी. क्या हमारे दंश के वीआई पी और वीवीआईपी इस तरह आपको कभी मिले या मिल सकेंगे? गरीब व आम पब्लिक का देश जो लोकतंत्र की दुहाई देते नहीं थकता वह कुछ- इस तरह से ढल गया है या ढाल दिया गया है कि यहां निर्वाचन के बाद हर व्यक्ति वीआईपी बन जाता है या बना दिया जाता है, वहीं उनके इशारे पर चलने वाले हर ब्यूरोके्रट की आज एक अलग ही दुनिया बना दी गई है जिसे हम आम आदमी की भाषा में  वीआईपी कल्चर कहते हैं. पूर्व के राजा महाराजाओं और अंग्रेजो से प्राप्त इस कल्चर को न हम त्याग सके हैं और लगता है न आगे इसको त्यागने का प्रयास कहीं किसी स्तर पर होगा. जिस गुलामी की जंजीर को तोडऩे के लिये लाखो करोड़ों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी आज अडसठ साल बाद भी हम उसी में जकड़े हुए है. साहब और जनप्रतिनिधियों के नाम पर चुने जाने वालों के बंगलों में गुलामी प्रथा अर्दली के रूप में, माली, चपरासी, रसोइये,नाई,धोबी और अन्य कई रूपों में जारी है जिसके चलते वीआईपी कल्चर पूरे शबाब पर है साहब तो छोडिये मेम साहब और उनके साहब जादों और साहब जादियों की देख रेख का जिम्मा भी गुलामो की तरह  इस देश के वोटर सम्हाले हुए हैं.असल में इस  कल्चर के बने रहने का कारण यह है कि देश की आजादी का संघर्ष और उसके बलिदान को सब भूल गये है.छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की एक खबर है कि आवारा पशुओं को हटाने का अभियान उन सडकों पर शुरू किया गया है जहां वीआईपी लोग आते जाते हैं, जहां वीआईपी लोग रहते हैं और घूमने निकलते हैं. क्यां आम आदमी को गंदगी और आवारा मवेशियों के सड़क पर घूमने से  परेशानी नहीं होती? किसी आम आदमी के मरने के बाद ही तो प्रदेश में यह अभियान शुरू किया गया? तो यह वीआई पी रोड़ और वीआई पी सड़के कहां से आ गई? वीआईपी कल्चर में रहने वाला हर व्यक्ति आम आदमी से ज्यादा सुरक्षित है फिर ऐसा विभाजन क्यों? कोई भी अभियान चलता है या कोइ्र्र सुविधा देने की बात होती है तो आम जनता को क्यों वर्गो में बांट दिया जाता है? वीआईपी और वीवीआई पी कल्चर आम जनता के लिये दुखदायी होता जा रहा है?प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आम आदमियों के बीच से प्रधानमंत्री बने हैं उनकी चण्डीगढ़ यात्रा के दोैरान  वीवीआईपी कल्चर की वजह से एक शहीद की अंत्योष्टी नहीं हो सकी. इससे दुखी प्रधानमंत्री ने इस बाधा के लिये जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाही का आदेश दिया-शायद इस घटना के बाद देश के कुछ राज्यों में तो वीआईपी  कल्चर को बनाये रखने वालों के ख्यालों में कुछ परिवर्तन आयेगा-ऐसी आशा है!

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

ANTONY JOSEPH'S FAMILY INDX

History of Mattappallil -
 Madukkakuzhy family

ANTONY JOSEPH”S
FAMILY. INDEX
 A family with its own tradition and values,started many decades ago from a place called EdamattomPallattu in Kottayam districtin Kerala.They have a well settled position not only in India but also abroad. The members of this family are not only in different parts of India but also in many developed countries like United States of America ,Rome,South Arabia multiplying the family's honour and fame with their professional expertise in the field of education,politics , journalism etc. In this note we go through a rough idea of the family history. Since we don't have any knowledge about many members of the old generations, we regret to skip off the details about them.Now with the help of the eldest member of this family ie J M Thomas (Thomachen)of Kottayam,we get a picture about the members of our family and how it branched.We belong to Edamattam Pallattu family. The family starts with two avakashi sist…

प्रेम, सेक्स-संपत्ति की भूख ...और अब तो रक्त संबंधों की भी बलि चढऩे लगी!

कुछ लोग तो ऐसे हैं जो मच्छर, मक्खी, खटमल और काकरोच भी नहीं मार सकते लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो हैवानियत की सारी हदें पार कर मनुष्य यहां तक कि अपने रक्त संबंधों का भी खून करने से नहीं हिचकते. इंसान खून का कितना प्यासा है वह आज की दुनिया में हर कोई जानता है क्योंकि आतंकवाद और नक्सलवाद के चलते रोज ऐसी खबरें पढऩे-सुनने को मिल जाती है जो क्रूरता की सारी हदें पार कर जाती हैं. मनुष्य का राक्षसी रूप इस युग में ही देखने को मिलेगा शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी. आतंकवाद और नक्सलवाद हिंसा के दो रूप के अतिरिक्त अब रिश्तों के खून का वाद भी चल पड़ा है जो सामाजिक व पारिवारिक मान्यताओं, संस्कृति- परंपराओं का भी खून कर रहा है. नारी जिसे अनादिकाल से अबला, सहनशक्ति और मासूमियत, ममता और प्रेम का प्रतीक माना जाता रहा है उसका भी अलग रूप देखने को मिल रहा है. रक्त संबंध, रिश्ते, सहानुभूति, आदर, प्रेम, बंधन सबको तिलांजलि देकर जिस प्रकार कतिपय मामलों में अबलाओं ने जो रूप दिखाना शुरू किया है वह वास्तव में ङ्क्षचंतनीय, गंभीर और खतरनाक बन गया है. नारी के कई रूप हमें इन वर्षों के दौरान देखने को मिले हैं लेकिन ज…