सोमवार, 14 सितंबर 2015

किसानों की फसल बर्बाद होने व कृषकों की आत्महत्या के लिये आखिर कौन जिम्मेदार?







यह सही है कि इस साल बहुत पहले ही मौसम विभाग ने इस बात का अनुमान लगा दिया था कि इस बार साामान्य से कम बारिश होगी लेकिन क्या ऐसी स्थिति में सरकार की तरफ से ऐसे कोई कदम उठाये गये जिससे किसानों की तकनलीफ दूर हो सके और उनकी तकलीफे दूर हो सके.हर बार चाहे वह सूखे कि स्थिति हो या ज्यादा बारिश अथवा कम बारिश हमारा किसान आसमान की तरफ देखने के लिये मजबूर है.उसे कुछ सूझता नहीं कि वह क्या करें? क्या न करें? बारिश आने से पूर्व वह बैेंक से कर्ज लेकर अच्छी फसल पैदा करने के लिये पैसे का जूगाड़ करता. अपना बतँन भाड़ा बेचकर या घर गिरवी रखकर उन बैंक वालों से ऋण प्राप्त करता है जो देने के समय तो मुस्कराते हैं हंसते हैं लेकिन वसूली के समय क्रूरता की सारी हदें पार कर देते हैं. किसान बैंक व साहूकार से प्राप्त ऋण से न केवल बीज खरीदता है बल्कि खाद व दवा आदि की भी खरीदता है इसके बाद फसल बोता है जिसे वह भगवान भरोसे छोड़ देता है. भगवान ने पानी बरसाया तो ठीक वरना उसे सरकार के बंाध और नालों पर भरोसा करना पड़ता है इसके लिये भी उसे इतनी मगरमच्छी करनी पड़ती है कि कई जगह तो सर फु टव्वल की नोबत आ जाती है. अडसठ साल में देश में शासन करने वाली सरकारें प्रकृति के सारे हालातों से वोकिफ है उसे मालूम है कि कब सूखा पड़ता है कब बाड़ की स्थिति निर्मित होती है और कब ऐसे हालाता पैदा होती है कि खड़ी फसल बर्बाद हो जाती है उसने इस स्थिति से निपटने के लिये कई ऐसे विभागों में मोटी मोटी तनखाह देने वाल अधिकारी ेकर्मचारियों  की नियुक्ति कर रखी है इनपर हर साल करोड़ों रूपये इन किसानों व अन्य आम नागरिकों की जेब से निकला पैसा लगता है.सवाल यह उठता है कि आखिर इतना पैसा व्यय करने के बाद भी किसानेों की फसल क्यो बर्बाद होती है?क्यों उन्हें आत्महत्या के लिये मजबूर होना पड़ता है ओर क्यों सरकार उनकी फसनों की  रक्षा करती? देश में कितने लोग खेती किसानी करते हैं क्या यह हमारी सरकार नहीं जानती?क्योंं वह ऐसी कोई योजना नहीं बनाती कि किसान खेत में फसल डालते ही उसे इस बात की गारंटी दे कि अगर किसी कारणवश उसकी फसल बर्बाद हो जाये तो उस हालत में सरकार उसकी बरपाई करेंगी और ऐसा क्यों नहीं की  जाती कि उसकी फसल अच्छी होने की स्थिति में वह सरकार को फसल का एक हिस्सा अच्छे दाम पर देगा. अगर ऐसा किसानों के साथ हो जाये तो उसकी आर्थिक स्थिति न केवल अच्छी होगी बल्कि उसे अपने आगे कि फसल पैदा करने मे ं प्रोत्साहन मिलेगा. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि हम देश में आज भी एक तरफ बाढ़ से जूझते हैं तो दूसरी तरफ सूखे की मार सहते हैं1पांच साल की योजना ऐसी बनाई जा सकती है कि देश की नदियों को एक दूसरे से जोड़कर इस गंभीर समस्या का समाधान करें.क्यों नहीं इस कार्य के  िलये प्राथमिकता तय की जाती.अब जहां तक किसानों की आत्महत्या का मामला है किसानो को ऋण देने के पूूर्व सरकार को यह तय करना होगा कि वह जो ऋण उसकों दे रहा है उसकी वसूली में उस समय ढिलाई बरतेगी जब उसकी फसल प्राकृतिक आपउा से खराब होगी. हमारा किसान इतना गरीब है कि वह प्राकृतिक आपदा झेलने की स्थिति में नहीं है उसके लिेये मछली पालन,मुर्गी पालन बकरी पालन और अन्य लघु उद्योगों की वैकल्पिक व्यवस्था करना भी जरूरी है जब तक ऐसी व्यवस्था नहीं की जायेगी तब तक देश का किसान खुशहाल नहीं होगा.
एक फसली परंपरा को छोड़कर सालभर अबग अलग फसल लेने के लिये चाहे वह आम अमरूद कटहल,नारियल  जैसे बड़े वृक्षों पर लगने वाले फल ही क्यों न हो लेने के लिये प्रेरित करना चाहिये जबकि सरकार को विपरीत मोसम में  इन फसलों को जीवित रखने के लिये पानी की व्यवस्था अपने स्त्रोतो से करनी होगी.