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प्रेम, सेक्स-संपत्ति की भूख ...और अब तो रक्त संबंधों की भी बलि चढऩे लगी!





कुछ लोग तो ऐसे हैं जो मच्छर, मक्खी, खटमल और काकरोच भी नहीं मार सकते लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो हैवानियत की सारी हदें पार कर मनुष्य यहां तक कि अपने रक्त संबंधों का भी खून करने से नहीं हिचकते. इंसान खून का कितना प्यासा है वह आज की दुनिया में हर कोई जानता है क्योंकि आतंकवाद और नक्सलवाद के चलते रोज ऐसी खबरें पढऩे-सुनने को मिल जाती है जो क्रूरता की सारी हदें पार कर जाती हैं. मनुष्य का राक्षसी रूप इस युग में ही देखने को मिलेगा शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी. आतंकवाद और नक्सलवाद हिंसा के दो रूप के अतिरिक्त अब रिश्तों के खून का वाद भी चल पड़ा है जो सामाजिक व पारिवारिक मान्यताओं, संस्कृति- परंपराओं का भी खून कर रहा है. नारी जिसे अनादिकाल से अबला, सहनशक्ति और मासूमियत, ममता और प्रेम का प्रतीक माना जाता रहा है उसका भी अलग रूप देखने को मिल रहा है. रक्त संबंध, रिश्ते, सहानुभूति, आदर, प्रेम, बंधन सबको तिलांजलि देकर जिस प्रकार कतिपय मामलों में अबलाओं ने जो रूप दिखाना शुरू किया है वह वास्तव में ङ्क्षचंतनीय, गंभीर और खतरनाक बन गया है. नारी के कई रूप हमें इन वर्षों के दौरान देखने को मिले हैं लेकिन जो रूप अभी हाल के दिनों में देखने को  मिला है उसने तो समाज को एक तरह से हिलाकर ही रख दिया है. जिस नारी को समाज ने शिखर तक देखा उसने दौलत और शोहरत, सेक्स के लिये अपने ही खून का खून कर दिया. बात मुंबई के इन्द्राणी मुखर्जी का है जिसने अपनी ही बेटी को दौलत के खातिर रास्ते से हटा दिया और अब वह जेल में अन्य कैदियों के साथ चार रोटी और बाद में अन्य अपने नित्य कर्मों के लियेतार में हैं. दूसरा किस्सा देश व विश्व में रोल मॉडल के रूप में प्रस्तुत राज्य गुजरात के अमरेली का है जहां एक बहन ने अपने प्रेमी के साथ अफेयर में आड़े आने के कारण इस क्रूरता से अपने सगे भाई का वध किया कि सुनने वालों केे रोंगटे खड़े हो गये और देखने वालों की आंखें फटी की फटी रह गई. बताते हैं उसका इरादा अपने माता और पिता का भी खून करने का था लेकिन इससे पूर्व ही वह पकड़ ली गई. इस लड़की ने बड़े तरीके से अपने भाई के साथ आंखमिचौली खेली, आंख में पट्टी बांधी, कुर्सी पर बिठाया और दुपट्टे से हाथ को बंाधा, किचन में गई चाकू लेकर आई- भाई से कहा कि अब में तुझे मार डालूंगी और चाकू उसके शरीर में दो बार घुसाकर मार डाला, बाथरूम जाकर खून साफ किया व नये कपड़े पहन बाहर जाकर लोगों को बताया कि भाई को कुछ हो गया. यह बयान उसने पुलिस को भी दिया. तीसरी घटना बंगलोर के गोकुल की है जिसने पूर्व पे्रमिका को पाने के लिये अपनी पत्नी का खून कर दिया तथा इसे छिपाने व अपने प्रेमिका के पति जोस को फंसाने के लिये विमानों को उड़ाने की धमकी उसके सिम को मोबाइल में डालकर दी. लोगों की तकनीक देखिये कितनी हाईटेक हो गई हैं. रोज हो रही ऐसी घटनाओं ने उन सामाजिक मान्यताओं पर ही प्रश्र चिन्ह लगा दिया है जो वर्षों से चली आ रही है. मां-बाप, भाई-बहन, पति-पत्नी, चाचा-चाची, दादा-दादी, पोता-पोती, नाना-नानी और ऐसे कई रक्त संबंधों से भरे समाज में जब खूनी खेल होता है तो समाज का चौकना स्वाभाविक है, लेकिन यह सब बंद कमरों और बंद दीवारों के भीतर होता है जिसपर निगाह तभी पड़ती है जब सब हो जाता है. इसलिये इससे निपटने के लिये भी समाज में ऐसा माहौल तैयार करना वर्तमान परिथिति में कठिन है. अब सिर्फ हम यही कह सकते हैं कि आगे चलकर सब ठीक हो जायेगा या स्थिति और खराब हो जायेगी. इसमें दूसरे स्थिति के ही ज्यादा चांसेस हैं.

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ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
यहां करीब तीन दर्जन उद्योग ऐसे हैं जो चौबीसों घंटे धूल भरी आंधी उगल रहे हैंं ,जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं ह्रै. नियंत्रण है तो भी वह कुछ दिनों में छूटकर आसमान और धरती दोनों पर कब्जा कर लेते हैं.
चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग कालिख पुतवा लेत…

किस्मत बदलती है,दाना अब खुशहाल लेकिन...!

मनुष्य जीवन के बारे में बहुत सी बाते कहीं गई हैं-कहा जाता है कि इंसान पैदा होते ही अपने कर्मो का सारा फल अपने साथ लेकर आता है. यह भी कहा जाता है कि जिसके किस्मत में जो हैं उसे मिलकर ही रहेगा. यह भी कहा गया है कि मनुष्य को अपने कर्मो का फल भी इसी जन्म में भोगना पड़ता है.हम जब ऐसी बातों को  सुनते हैं तो लगता है कि कोई हमें उपदेश दे रहा है या फिर ज्ञान बांट रहा है, किन्तु जब हम इसे अपने जीवन में ही अपनी आंखों से देखते व सुनते हैं तो आश्चर्य तो होता ही है कि वास्तव में कुछ तो है जो सबकुछ देखता सुनता और निर्णय लेता है. यह बाते हम उस व्यक्ति के बारे में कह रहे हैं जिसने पिछले साल पैसे न होने के चलते अपनी पत्नी की लाश को 10 किलोमीटर तक पैदल अपने कंधे पर ढोने के बाद अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में प्रमुख स्थान प्राप्त किया था. ओडिशा के गरीब आदिवासी दाना मांझी की जिंदगी साल भर में अब पूरी तरह बदल चुकी है. उसकी गरीबी अब उसका पीछा छोड़ चुकी है.इसी सप्ताह मंगलवार पांच तारीख को मांझी कालाहांडी जिले के भवानीपटना से अपने घर तक उस होन्डा  बाइक पर सफर करता हुआ पहुंचा ,जिसे उसने शो रुम से 65 हजार रुपये मे…