सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

जनता क्यों सहन करे आरक्षण की आंच को, यह तो कूट-नीतिज्ञों की लगाई आग है वे ही झुलसे!



आजादी के अड़सठ साल बाद भी अगर हम अपने आपको इस लायक नहीं बना सके कि आर्थिक,सामाजिक व भौतिक आधार पर अपने व अपने परिवार को खड़ा नहीं कर पाये तो यह किसकी गलती है? हमें अपने आप पर शर्म करनी चाहिये कि इतना अवसर,इतनी सुविधाएं और भरपूर आरक्षण मिलने के बाद भी हम एक के बाद एक समाज आरक्षण की मांग क रते जा रहे हैं.आज कौन बताएगा कि हम आर्थिक आजादी का स्वाद इतने साल बाद भी क्यों नहीं चख पा रहे हैं-यह सवाल उठाते हुए हम पटेल समुदाय के आरक्षण आंदोलन की खिलाफत नहीं कर रहे बल्कि यह बताना चाह रहे हैं कि आरक्षण को अब वोट बैंक की राजनीतिक हथियार के रूप में क्यों इस्तेमाल किया जा रहा है? क्यों नहीं लोगों ने इतने सालों में अपने व  अपने परिवार को सारी सराकारी सुविधाएं प्राप्त होने के बाद भी अपने को सीधा खड़ा होने लायक तक नहीं बनाया. वर्तमान माहौल में किसी भी समाज के आरक्षण की मांग जायज हो गई है क्योंकि सराकर में बैठने वालों ने इसे ऐसा बना दिया.  एक तरह से आरक्षण लगता है लोगों के मूल अधिकार में शामिल हो गया है.इसे अब ऐसे मांगा जा रहा है जैसे यह हर आदमी का संवैधानिक अधिकार हो जबकि संवैधानिक व्यवस्था के तहत आरक्षण को बहुत पहले खत्म कर दिया जाना चाहिये था लेकिन विभिन्न सरकारों ने अपनी पार्टी का वोट बैंक बढ़़ाने के लिये आरक्षण का उपयोग किया और अब यह सरकार के लिये ही सरदर्द बनता जा रहा है. आरक्षण को लेकर राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान जो हो रहा वह अलग.वीपी सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में आरक्षण आंदोलन पक्ष व विपक्ष में इतना बढ़ा कि सरक ार की नाक में दम ला दिया. अबका समय भी कहीं उस ओर तो नहीं बढ़ रहा? पटेल आरक्षण आंदोलन,जाट आरक्षण आंदोलन,मराठा आरक्षण आंदोलन, मुस्लिम आरक्षण आंदोलन यह सभी तो इस समय सक्रिय हैं कुछ तो एक दूसरे से लिंक होकर बड़े आंदोलन का  रूप धारण कर चुका है. पूर्व व्यवस्था को ताक में रखकर आरक्षण किये जा रहे हैं जबकि होना तो यह चाहिये कि सभी किस्म के आरक्षणों को बंद किया जाये और अगर देना ही है तो आरक्षण आर्थिक आधार पर निर्धारित अवधि के लिये सीमित किया जाये. जब तक ऐसी व्यवस्था नहीं होगी गुजरात की तरह का आंदोलन विभिन्न राज्यों में चलेगा जो सरकारों के लिये एक समस्या बनकर खड़ी रहेगी. पटेल आरक्षण आंदोलन में सोलह लाख लोगों की भीड़ एक युवक द्वारा इकट्ठी कर लेना इस आंदोलन की गंभीरता को प्रदर्शित करता है. ऊपर से पुलिस की संवेदनहीनता,अविवेकशीलता और अदूरदर्शिता ने इस आंदोलन को ज्वाला का रूप देने की भूमिका अदा की है. एक जाति और धर्म के नाम पर तो आरक्षण होना ही नहीं चाहिये. वर्तमान व्यवस्था में बदलाव लाकर उसे या तो पूरी तरह खत्म कर देना चाहिये या फिर आर्थिक व सामाजिक आधार तक सीमित रखना चाहिये.

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
यहां करीब तीन दर्जन उद्योग ऐसे हैं जो चौबीसों घंटे धूल भरी आंधी उगल रहे हैंं ,जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं ह्रै. नियंत्रण है तो भी वह कुछ दिनों में छूटकर आसमान और धरती दोनों पर कब्जा कर लेते हैं.
चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग कालिख पुतवा लेत…

ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …