बुधवार, 15 जुलाई 2015

क्या हम कभी ट्रेन लेट न होने का जापानी रिकार्ड इक्यावन सेक ण्ड तोड़ पायेंगे?



इसमें दो मत नहीं कि हमारी रेलवे ने पिछले वर्षों में बहुत प्रगति की है लेकिन क्या आम आदमी इस प्रगति और उसकी सेवाओं से संतुष्ट है? क्या हम जापान या किसी अन्य बड़े देश की तरह या अपने हवाईअड्डों की तरह ट्रेन सुविधा उपलब्ध करा पायेंगे? क्या हमारी ट्रेनें वक्त पर आवाजाही करेंगी? क्या ट्रेनें और रेलवे स्टेशन कभी साफ सुथरे होंगे? क्या हमारी पटरियों पर ट्रेनें जापान की बुलेट ट्रेनों की तरह स्पीड़ से दौड़ती नजर आयेंगी? क्या इसे उपयोग करने वाले साफ सुथरे रेलवे स्टेशनों को उसी तरह रहने देेंंगे जैसे विदेशों में लोग रखते हैं? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिसका जवाब हम वर्षों से खोज रहे हैं लेकिन दूर-दूर तक हमें कहीं इसका जवाब नहीं मिल रहा. यह सही है कि नरेन्द्र मोदी के सत्ता  में आने के बाद रेल को आधुनिकता की ओर ले जाने का कुछ प्रयास जरूर हुआ लेकिन इसके साथ-साथ किराये में बढ़ोत्तरी, टिकिट व्यवस्था में फेरबदल भी हुआ. कुछ और नई टे्रनों को पटरियों पर उतारा भी किन्तु हम अपने सपनों की ट्रेन अब तक नहीं देख सकें. ट्रेनें न समय पर चलती है. न उसमें सुरक्षा है, न स्वच्छता है. किसी डिब्बे में पानी है तो बिजली नहीं, खाने-पीने का पर्याप्त इंतजाम नहीं. यात्रियों का सामान चूहे कुतर डालते हैं. सफाई भी मनमर्जी अनुसार होती है. स्टेशनों में यात्रियों का जमावड़ा किसी  मेले जैसा लगता है, इसमें जो बलवान है वह गाड़ी पर चढ़ गया वरना देखते खड़े रह जाने के अलावा उसके पास कोई दूसरा चारा नहीं. इन परिस्थितियों में हमारे सामान्य दर्जे की बोगियों में आज भी यात्री ठूंस-ठूसकर भरे जाते हैं. लोकल ट्रेनों की कमी  के कारण लंबी दूरी की ट्रेनों में ज्यादा संख्या में यात्री ठूंस-ठूसकर भरे जाते हैं. कुछ तो आज भी टायलटों में सफर करने मजबूर हैं- ऐसे  हालात में बुलेट ट्रेन का सपना तो दूर वर्तमान में जो ट्रेनें चल रही हैं उनकी साफ-सफाई, समय पर परिचालन, सुरक्षा सब दिवा स्वप्र है. अगर हम जापान की तुलना करें तो ऐसा लगता है कि कहां स्वर्गीय यात्रा और कहां यहां की नरकीय यात्रा? जापान जहां  के मॉडल पर हम अपनी रेल सेवा के परिचालन का दावा करते हैं उसका आक लन करें तो हमारा सपना यूं ही बिखरता नजर आता है. वहां किसी स्टेशन पर अगर कोई ट्रेन  9 बजकर 25 मिनट पर करीब पांच सौ किलोमीटर का सफर कर अपने आखिरी स्टेशन पर पहुंचती है तो उसके प्लेटफार्म पर रुकने और यात्रियों के चढ़ने उतरने के बारह मिनट में ही वापस चली जाती है, उस दौरान सफाई, स्टाफ चेंज, टेक्निकल जांच सब कुछ हो जाता है. 17 बोगियों वाली ट्रेन जो 200 किलोमीटर प्रतिघंटा से चलती है उसे 12 मिनट में तैयार कर वापस भेज देना क्या हम अपने देश में संभव बना सकते हैं? जापान में बुलेट ट्रेन की रफ्तार ही तीर जैसी होती है, इससे जुड़ी हर बात, हर चीज तीर या बंदूक की गोली जैसी होती है ..जैसे कोई ट्रेन 9 बजकर 32 मिनट पर आती है तो 9-44 मिनट पर वापस रवाना कर दिया जाता है. पहला दो ढ़ाई मिनट सवार यात्रियों के उतरने में गुजर जाता है वहीं कोई भी यात्री बाहर आता उससे पहले एक महिला पॉलिथिन बैग लेकर गेट पर खड़ी हो जाती  है. लोग उसमें अखबार...खाली बॉटल जैसी चीजों को डालते हुए निकल जाते हैं. इसके बाद ट्रेन के हर एक बोगी में सफाईकर्मी दाखिल होते हंै. इन बागियों में 65 से लेकर 100 सीटें हो सकती हैं. एक-एक सीट की सफाई, फर्श की सफाई, उपरी रैक का निरीक्षण होता है फिर सामने के ट्रे की सफाई होती है ..उसके बाद सारे सफाईकर्मी बाहर निकलते हैं...और इंतजार कर रहे यात्रियों को झुककर धन्यवाद देकर चल पड़ते हैं अगली ट्रेन की सफाई के लिए. 12 मिनट के समय में इतना कुछ क्या हमारी ट्रेनों में इसे संभव बनाया जा सकता है? सफाई  का लोग कितना ख्याल रखते हैं इसका उदाहरण यह है कि कचरा उस समय पर अपने साथ रखते हैं जब तक कि उन्हें वेस्ट बॉक्स नहीं मिल जाता. सात मिनट में पूरी की पूरी ट्रेन साफ. और इस ट्रेन को साफ करने वालों में ज्यादातर महिलायें जिनकी औसत उम्र 52 साल और इस तरह से बरसों से टोक्यो के स्टेशन ही नहीं जापान के सभी स्टेशनों पर काम हो रहा है, फिर भी हम कुछ नहीं सीख पाये. हमारे नेतागण कई बार जापान का दौरा कर आये कुछ सीखा? दिलचस्प बात तो यह है कि रोज जापान में 800 से ज्यादा तेज गति की बुलेट ट्रेन चलती है पर लेट होने का औसत समय 1 मिनट से भी कम  है . एक और दिलचस्प बात यह कि जापान में पचास सालों से गोली की गति से चलने वाली ट्रेनें कभी दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुई चूंकि वे समय का पूरा ख्याल रखती है. ट्रेन लेट होने का औसत समय 51 सेकण्ड है जो विश्व रिकार्ड है, जबकि यहां एक दुर्घटना सिर्फ इसलिये हुई थी कि ट्रेन नब्बे सेकण्ड विलम्ब से चल रही थी और उसका ड्रायवर टेंशन में आ गया था. हमारी सरकार की मंशा बुलेट ट्रेन चलाने की है लेकिन उसे पहले कुछ विशेषताओं को अंगीकार करना होगा.
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