मंगलवार, 21 जुलाई 2015

नैतिकता, सिद्धांत सब पुरानी बात इस्तीफों की मांग को लेकर आंदोलनों का औचित्य क्या





व्यापमं, नान घोटाले के लिये कौन जिम्मेदार है? क्या मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह? क्या छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह? इसका जवाब सीधे तौर पर हां या न में हो सकता है लेकिन इन मंत्रियों के इस्तीफे से संपूर्ण मसला हल हो जायेगा? अगर हां तो उन्हें तत्काल त्यागपत्र दे देना चाहिये- न तो ऐसे किसी आंदोलन को चलाने का कोई औचित्य नहीं! यही बात वसुन्धरा राजे, सुषमा स्वराज पर ललितगेट मामले, स्मृति इरानी पर फर्जी डिग्री और महराष्ट्र की मंत्री श्रीमती पंकजा मुण्डे जिन पर भूमि घोटाले का आरोप है, पर भी उठ रहा है. सभी मामले कहीं न कहीं किसी रूप में कोर्ट की परिधि में है. इतना हल्ला इन मामलों पर मचाने की बनिस्बत हम क्यों नहीं कोर्ट के फैसले का इंतजार करते? हम अपनी संस्कृति, सिद्धांत और नैकितकता की चाहे जितनी दुहाई दें हम दूसरे देशों के मुकाबले में ऐसे मामलों में बहुत पीछे हैं. बुधवार को जापान से एक खबर आई कि वहां तोशिबा में सत्यम जैसी हेराफेरी के बाद सीईओ रिसाको तनाओ, वाइस चेयरमेन नोरियो ओरछेअन्ने ने न केवल अपने पदों से इस्तीफा दिया बल्कि आधा मिनट झुककर कहा कि हम शर्मिन्दा हैं. हमारे देश में बात कुछ अलग है. नैतिकता का तकाजा बताकर इस्तीफा देने वाली बात अब पुरानी हो गई है. पहले घपले-घोटाले तो दूर की बात एक छोटे से ट्रेन हादसे पर भी सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए मंत्री व अफसर पद छोड़ देते थे लेकिन आज स्थिति बदल गई है. इस्तीफा दें या न दें वह संबन्धित मंत्री की नैतिकता पर निर्भर हो गया है. इसमें दिलचस्प स्थिति यह बन गई है कि आज जो लोग जो इस्तीफा मांग रहे हैं वे भी कितने दूध के धुले हैं? सत्ता में रहते ऐसे लोगों ने या उनके साथियों के ढेरों ऐसे मामले हैं जिसमें देश को काफी चूना लगा है. एक बार कुर्सी से चिपकने के बाद कोई भी उससे मुक्त होना नहीं चाहता. युद्ध में जीत-हार दोनों की जिम्मेदारी कप्तान की होती है. जीत हुई तो उसे श्रेय और हार हुई तो भर्त्सना. यही हाल खेल में भी है. हम कितनी बार देख चुके हैं कि क्रिकेट में जीत के बाद कप्तान और उसके साथियों को लोग जहां हाथों-हाथ उठा लेते हैं, वहीं हार होने पर वह सबकुछ कर डालते जो कम से कम खेल के मामले में तो नहीं करना चाहिये. राजनीति और खेल दोनों में फर्क है. राजनीति में आज जो कुछ हो रहा है अगर उससे जनता का कोई हित होता है तो यह होना ही चाहिये, मगर यहां तो आगे सब खाली ही खाली नजर आता है. नान घोटाले का मामला अदालत पहुंच चुका है. व्यापमं घोटाले का मामला सीबीआई के सुपुर्द है-अन्य प्राय: सभी मामलों में मुकदमे न्यायालयों में लंबित हैं फिर इस्तीफे की मांग से क्या समस्या का हल हो जायेगा?  इन फैसलों का इंतजार करना ही चाहिये. सत्ता में बैठे लोग व विपक्ष दोनों ही इन घपले घोटालों की आड़ में कहीं न कहीं अपना हित खोजने में लगे हैं. इन आंंदोलनों व सरकारी तंंत्र की खामोशी ने सारे अन्य जनहित के मुद्दों से सभी का ध्यान हटा दिया है.
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