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ताउम्र जेल या फांसी?, बेहतर तो यही कि ताउम्र कैद में रहकर कठोर यातना भुगते!



'जेल में ताउम्र सड़ने से मर जाना ही अच्छाÓ- यह हमारी राय नहीं बल्कि देश के सुप्रीम कोर्ट की है-जेल में ताउम्र सड़ रहे ऐसे कैदी भी संभवत: यही चाहते होंगे लेकिन उनके चाहने से क्या होता है उन्हेंं तो अपने किये की सजा भुगतनी ही होगी. सुप्रीम कोर्ट की राय व कैदियों की मंशा का अगर विश्लेषण करें तो बात साफ है कि फांसी से बेहतर ताउम्र सजा है, चूंकि अपराधी को जिंदगीभर  इस बात का तो एहसास होता है कि उसने जो कृत्य किया वह कितना घिनौना था कि उसे नरक धरती पर ही जीते जी मिल गया. आतंकवाद में लिप्त याकूब मेमन को फांसी के बाद एक मानवाधिकारी महिला को यह कहते हुए सुना गया कि फांसी से
अपराध बंद नहीं होगा फिर फांसी का क्या औचित्य? अपराधी  जन्मजात अपराधी नहीं होता उसे परिस्थितियां ही ऐसा बना देती है- सही है कोई व्यक्ति जन्म से अपराधी नहीं होता, उसके कर्म उसे अपराधी बना देते हैं. अगर किसी ने अपराध किया है तो उसे इसकी सजा तो भुगतनी ही होगी, यह सजा फांसी न होकर अगर जन्मजात पछताने की है तो फांसी से भी बढ़ी सजा मानी जायेगी क्योंकि फांसी, बंदूक की गोली या जहर का इंजेक्शन तो उसे इस जन्म से मुक्ति दिला देगी. मरने के बाद क्या होता है किसे मालूम! कौन पश्चाताप करेगा? असल में फांसी की सजा देकर हम उस पूरे परिवार को भी सजा दे रहे हैं जिसने कोई पाप या दुष्कर्म किया ही नहीं. अगर जिंदगीभर किसी को एक ही कमरे मेंं ठूंसा जाता है तो उसे न केवल अपने किये पर पछतावा होगा बल्कि यह भी महसूस करेगा कि उसने जो किया वह गलत था लेकिन फांसी देकर तो सबकुछ खत्म हो जाता है. लोग जिदंगीभर एक काल कोठरी  में पड़े-पड़े सड़ते रहे और पछताते रहे इस लिहाज से भी फांसी से बेहतर उम्र कैद है. बहरहाल याकूब मेनन को फांसी वाले मामले में कई सवाल खड़े हो गये हैं. क्या डेथ वारंट जारी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की बैंच का फैसला, उसके बाद फांसी की सजा को अब फिर चुनौती बड़े पेचीदा प्रश्न खड़े कर रही है, आगे आने वाले समय इस मामले में सुनवाई होगी उसके बाद सुप्रीम कोर्ट तय कर सकता है कि आगे फांसी के निर्णयों को कैसे अमल में लाया जाये. वैसे जो व्यवस्था अपराध और अपराधियों को सजा के मामले में है वह इतनी पेचीदगीभरी है कि सजा मिलने में काफी देरी हो जाती है. यह कोई समझ नहीं पा रहा है कि जब  हमारा संविधान सर्वोच्च न्यायालय को सर्वोच्च मानता है तो उसके निर्णय के आगे अन्य अलग-अलग प्रक्रियाएं क्यों होती हैं? हम मानते हैं कि संवैधानिक दृष्टि से राष्ट्रपति को दया याचिका पर सुनवाई और सजा-ए-मौत को बनाये रखने या न रखने का पूर्ण अधिकार है लेकिन एक बार जब सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रपति कोई निर्णय ले लेते हैं तो उसे कैसे चुनौती दी जाती है? देश का सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च है, उसके आगे कुछ नहीं की व्यवस्था होनी चाहिये.

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उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
यहां करीब तीन दर्जन उद्योग ऐसे हैं जो चौबीसों घंटे धूल भरी आंधी उगल रहे हैंं ,जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं ह्रै. नियंत्रण है तो भी वह कुछ दिनों में छूटकर आसमान और धरती दोनों पर कब्जा कर लेते हैं.
चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग कालिख पुतवा लेत…

ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …