गुरुवार, 23 जुलाई 2015

ताउम्र जेल या फांसी?, बेहतर तो यही कि ताउम्र कैद में रहकर कठोर यातना भुगते!



'जेल में ताउम्र सड़ने से मर जाना ही अच्छाÓ- यह हमारी राय नहीं बल्कि देश के सुप्रीम कोर्ट की है-जेल में ताउम्र सड़ रहे ऐसे कैदी भी संभवत: यही चाहते होंगे लेकिन उनके चाहने से क्या होता है उन्हेंं तो अपने किये की सजा भुगतनी ही होगी. सुप्रीम कोर्ट की राय व कैदियों की मंशा का अगर विश्लेषण करें तो बात साफ है कि फांसी से बेहतर ताउम्र सजा है, चूंकि अपराधी को जिंदगीभर  इस बात का तो एहसास होता है कि उसने जो कृत्य किया वह कितना घिनौना था कि उसे नरक धरती पर ही जीते जी मिल गया. आतंकवाद में लिप्त याकूब मेमन को फांसी के बाद एक मानवाधिकारी महिला को यह कहते हुए सुना गया कि फांसी से
अपराध बंद नहीं होगा फिर फांसी का क्या औचित्य? अपराधी  जन्मजात अपराधी नहीं होता उसे परिस्थितियां ही ऐसा बना देती है- सही है कोई व्यक्ति जन्म से अपराधी नहीं होता, उसके कर्म उसे अपराधी बना देते हैं. अगर किसी ने अपराध किया है तो उसे इसकी सजा तो भुगतनी ही होगी, यह सजा फांसी न होकर अगर जन्मजात पछताने की है तो फांसी से भी बढ़ी सजा मानी जायेगी क्योंकि फांसी, बंदूक की गोली या जहर का इंजेक्शन तो उसे इस जन्म से मुक्ति दिला देगी. मरने के बाद क्या होता है किसे मालूम! कौन पश्चाताप करेगा? असल में फांसी की सजा देकर हम उस पूरे परिवार को भी सजा दे रहे हैं जिसने कोई पाप या दुष्कर्म किया ही नहीं. अगर जिंदगीभर किसी को एक ही कमरे मेंं ठूंसा जाता है तो उसे न केवल अपने किये पर पछतावा होगा बल्कि यह भी महसूस करेगा कि उसने जो किया वह गलत था लेकिन फांसी देकर तो सबकुछ खत्म हो जाता है. लोग जिदंगीभर एक काल कोठरी  में पड़े-पड़े सड़ते रहे और पछताते रहे इस लिहाज से भी फांसी से बेहतर उम्र कैद है. बहरहाल याकूब मेनन को फांसी वाले मामले में कई सवाल खड़े हो गये हैं. क्या डेथ वारंट जारी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की बैंच का फैसला, उसके बाद फांसी की सजा को अब फिर चुनौती बड़े पेचीदा प्रश्न खड़े कर रही है, आगे आने वाले समय इस मामले में सुनवाई होगी उसके बाद सुप्रीम कोर्ट तय कर सकता है कि आगे फांसी के निर्णयों को कैसे अमल में लाया जाये. वैसे जो व्यवस्था अपराध और अपराधियों को सजा के मामले में है वह इतनी पेचीदगीभरी है कि सजा मिलने में काफी देरी हो जाती है. यह कोई समझ नहीं पा रहा है कि जब  हमारा संविधान सर्वोच्च न्यायालय को सर्वोच्च मानता है तो उसके निर्णय के आगे अन्य अलग-अलग प्रक्रियाएं क्यों होती हैं? हम मानते हैं कि संवैधानिक दृष्टि से राष्ट्रपति को दया याचिका पर सुनवाई और सजा-ए-मौत को बनाये रखने या न रखने का पूर्ण अधिकार है लेकिन एक बार जब सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रपति कोई निर्णय ले लेते हैं तो उसे कैसे चुनौती दी जाती है? देश का सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च है, उसके आगे कुछ नहीं की व्यवस्था होनी चाहिये.