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कानून इतना ढीला क्यों? संगीन जुर्म के अपराधियों को फरार होने का मौका कैसे मिलता है?



उरला रबर आयल फैक्ट्री में शुक्रवार को हुए ब्लास्ट में फैक्ट्री मालिक पर तत्काल कार्रवाही न होने को लेकर हमारे कानून की खामियां फिर उजागर हुई है. ऐसी घटना किसी गरीब या मध्यम वर्ग का व्यक्ति करता तो शायद उसे तत्काल गर्दन पकड़कर  सीखंचों के पीछे भेज दिया जाता. इतना ही नहीं उसे पीट-पीटकर चलने-फिरने लायक भी रहने नहीं दिया जाता. उरला में घटना पिछले शुक्रवार को हुई थी जिसमें तीन मजदूर जिंदा जल गये. फैक्ट्री बिना सरकारी नियमों का पालन करे चल रही थी तथा इसका संचालक बालेन्द्र उपाध्याय घटना के बाद कानून से बचने के लिये राज्य छोड़कर भाग गया. सवाल यहां यह उठता है कि कानून की नजरें क्यों इतनी कमजोर है कि वह अपराधियों पर निगाह भी नहीं रख सकती? जब मालूम था कि उसे इस व्यक्ति को आज नहीं तो कल इस मामले में गिरफ्तार  करना ही है तब घटना के बाद से उसपर निगरानी  क्यों नहीं रखी गई? यह तो ऐसा लगता है कि सरासर उसे भागने का मौका दिया गया? यह पहला अवसर नहीं है जब ऐसे मामलों में पुलिस का कथित  चेहरा नजर आ रहा है. घटना के बाद अपराधी पुलिस के सामने से जादुई तरीके से फरार हो जाते हैं और पुलिस आंख मलती रह जाती है. अकेले यह छत्तीसगढ़ पुलिस की बात नहीं है, देशभर में कई ऐसे हाई प्रोफाइल मामले हुए हैं जिसमें अपराधियों को भागने का मौका दिया गया है. एक संत आसाराम के पुत्र नारायण साईं को कथित अपराध के बाद ढूंढ निकालने के लिये सरकार के खजाने से लाखों रुपये खर्च किये गये. ऐसा इसलिये भी होता है ताकि अपराधी अदालतों में जाकर अपनी गिरफ्तारी पूर्व ही जमानत ले ले. कुछ मामले तो साफ है कि पुलिस
खुद ऐसा मौका देती है. शुक्रवार को रायपुर के उरला क्षेत्र में हुई इस गंभीर घटना के बाद पुलिस ने अपनी जांच प्रक्रिया पूरी कर अब जाकर मालिक के घर की चौकसी करना शुरू किया है जबकि यह काम तत्काल भी किया जा सकता था ताकि वह निकलकर भाग न जाये. अब उसके घरवालों को सताने का काम शुरू होगा, उसके बाद पुुलिस को  उसके संदिग्ध ठिकानों की जानकारी मिलेगी तब कुछ पुलिसवालों का दौरा कार्यक्रम बनेगा जिसपर सरकारी कोष से काफी पैसा खर्च होगा जो शायद उस पीड़ित परिवार को मिलने वाले मुआवजे से भी कहीं ज्यादा होगा. अपराधी को पकड़कर लाते तक मामला ठण्डा हो जायेगा, फिर सौदेबाजी होगी. यह सब करने की स्थिति क्यों आती है? क्योंकि हमारा कानून अपराधियों के मामले में बहुत कमजोर है. जब सभी को मालूम है कि घटना के लिये कौन जिम्मेदार है फिर उसे फरार होने का मौका क्यों दिया जाता है? रायपुर में उद्योग तो बहुत लगे लेकिन उनमें कर्मचारियों की सुरक्षा पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं. इससे पूर्व भी यहां ऐसी वीभत्स घटनाएं होती रही हैं और हो रही है किन्तु छत्तीसगढ़ शासन के श्रम विभाग की खामोशी से ऐसे संयत्र चलाने वालों के हौसले बुलंद हैं और मनमाना तरीके से श्रमिकों से काम लिया जाता है और लापरवाही से लोगों की  जान जाती है.

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