शनिवार, 25 जुलाई 2015

सुनसान सड़क पर बच्ची के रोने की आवाज, और गुस्से में भागती मां-'घर-घर की कहानी


सुनसान सड़क पर बच्ची के रोने
की आवाज, और गुस्से में
भागती मां-'घर-घर की कहानी

पति-पत्नी के बीच झगड़े आम बात है, यह झगड़े प्राय: हर घर में होते हैं, जो शाम या रात होते-होते फिर दोस्ती और पे्रम में बदल जाते हैं लेकिन इन सबके बाद भी कुछ मामले इतने अड़ियल हो जाते हैं कि इसके परिणाम घातक व पूरे परिवार को प्रभावित करने वाले हो जाते हैं- ऐसा ही एक मामला हाल के दिनों में प्रकाश में आया जो इतना घातक था कि अगर मौके पर हल  नहीं निकाला जाता तो संभव है पूरा परिवार बिछड़ जाता तथा  सभी संबन्धित लोगों को जिंदगीभर के लिये पछताना पड़ता. अक्सर मीडियाकर्मी रात में सारे दिन रात की टेंशन के बाद घर लौटते हैं तब उन्हें काफी ऐसे नजारे देखने मिलते हैं जो वास्तव में हमारे सामाजिक जीवन में रोजमर्रे की घटनाएं हैं. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रात को एक मीडियाकर्मी अपने काम से पूरा टेंशन लेकर वापस लौट रहा था तभी सड़क पर उसे एक बच्ची के रोने की आवाज सुनाई दी, पहले तो वह घबराया फिर पीछे मुड़कर देखा तो एक पांच-छह साल की बच्ची रोती हुई चली जा रही थी, स्कूटर सवार मीडियाकर्मी ने रूककर बच्ची से पूछा तो उसने बताया कि उसकी मां छोड़कर आगे निकल गई है. बच्ची को स्कूटर में बिठाकर मीडियाकर्मी पास के एक बहुमंजिले मकान के गार्डों के पास पहुंचा तो उसे याद आया कि इस बच्ची की मां भी है जो सड़क से आगे निकल गई है. वह बच्ची को गार्डों को सौंपकर वहां से फिर पीछे भागा तो देखा कि एक महिला पैदल गुस्से में चली जा रही है, उससे पूछा तो पता चला माजरा क्या है? किसी अच्छे घराने की भद्र महिला गुस्से में बिना चप्पल पहने ही शायद किसी ट्रेन के नीचे सिर देने के लिये निकल पड़ी थी. जब उसे मीडियाकर्मी ने उसके बच्चे की बात बताई तो उसके कदम थम गये- वह उस बच्चे पर ही भड़क गई कि तू क्यों पीछे चली आई. वास्तव में बच्ची पति-पत्नी के झगड़े को देखती रही और मां को बाहर निकलते देख उसके पीछे चली आई. बातचीत के दौरान और भी लोग एकत्रित हो गये. समझा-बुझाकर उसे उनके घर भेजा गया. पति महोदय झगड़े के बाद गुस्से में आराम फरमाने चले गये थे जब यह पता चला होगा तो उन महोदय पर क्या बीती होगी? इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. बहरहाल यह घर-घर की कहानी है जो कहीं न कहीं दोहरायी जाती है. अक्सर परिवारों में यह होता है किन्तु इसका खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ता है. पति-पत्नी में तो कोई गुस्से में अपने प्राण की बलि चढ़ा देता है लेकिन उन बच्चों का क्या कसूर? सवाल बहुत से खड़े होते हैं-अगर यह बच्ची या उसकी मां दोनों में से कोई भी किसी गलत हाथ में पड़ जातीं तो? पत्नी मरने का इरादा छोड़कर घर आ जाती तो संभव है फिर पति-पत्नी दोनों मिलकर बच्ची को खोजने निकलते, तब तक देर हो गई होती? रायपुर पुलिस की गश्त पर भी सवाल उठता है? शहर की सड़कों पर रात में कभी पुलिस गश्त दिखाई नहीं देती, क्राइम स्क्वाड की गाड़ियां कहां है? कब व किसे लेकर कहां घूमती रहती है? हम डिजिटल इंडिया, वाय-फाय की बात करते हैं, सड़कों पर सीसीटीवी क्यों नहीं? कई मार्गों, गलियों यहां तक कि चौराहे भी घूप्प अंधेरा हैं, फिर कोई घटना हो जाये तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?