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सुनसान सड़क पर बच्ची के रोने की आवाज, और गुस्से में भागती मां-'घर-घर की कहानी


सुनसान सड़क पर बच्ची के रोने
की आवाज, और गुस्से में
भागती मां-'घर-घर की कहानी

पति-पत्नी के बीच झगड़े आम बात है, यह झगड़े प्राय: हर घर में होते हैं, जो शाम या रात होते-होते फिर दोस्ती और पे्रम में बदल जाते हैं लेकिन इन सबके बाद भी कुछ मामले इतने अड़ियल हो जाते हैं कि इसके परिणाम घातक व पूरे परिवार को प्रभावित करने वाले हो जाते हैं- ऐसा ही एक मामला हाल के दिनों में प्रकाश में आया जो इतना घातक था कि अगर मौके पर हल  नहीं निकाला जाता तो संभव है पूरा परिवार बिछड़ जाता तथा  सभी संबन्धित लोगों को जिंदगीभर के लिये पछताना पड़ता. अक्सर मीडियाकर्मी रात में सारे दिन रात की टेंशन के बाद घर लौटते हैं तब उन्हें काफी ऐसे नजारे देखने मिलते हैं जो वास्तव में हमारे सामाजिक जीवन में रोजमर्रे की घटनाएं हैं. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रात को एक मीडियाकर्मी अपने काम से पूरा टेंशन लेकर वापस लौट रहा था तभी सड़क पर उसे एक बच्ची के रोने की आवाज सुनाई दी, पहले तो वह घबराया फिर पीछे मुड़कर देखा तो एक पांच-छह साल की बच्ची रोती हुई चली जा रही थी, स्कूटर सवार मीडियाकर्मी ने रूककर बच्ची से पूछा तो उसने बताया कि उसकी मां छोड़कर आगे निकल गई है. बच्ची को स्कूटर में बिठाकर मीडियाकर्मी पास के एक बहुमंजिले मकान के गार्डों के पास पहुंचा तो उसे याद आया कि इस बच्ची की मां भी है जो सड़क से आगे निकल गई है. वह बच्ची को गार्डों को सौंपकर वहां से फिर पीछे भागा तो देखा कि एक महिला पैदल गुस्से में चली जा रही है, उससे पूछा तो पता चला माजरा क्या है? किसी अच्छे घराने की भद्र महिला गुस्से में बिना चप्पल पहने ही शायद किसी ट्रेन के नीचे सिर देने के लिये निकल पड़ी थी. जब उसे मीडियाकर्मी ने उसके बच्चे की बात बताई तो उसके कदम थम गये- वह उस बच्चे पर ही भड़क गई कि तू क्यों पीछे चली आई. वास्तव में बच्ची पति-पत्नी के झगड़े को देखती रही और मां को बाहर निकलते देख उसके पीछे चली आई. बातचीत के दौरान और भी लोग एकत्रित हो गये. समझा-बुझाकर उसे उनके घर भेजा गया. पति महोदय झगड़े के बाद गुस्से में आराम फरमाने चले गये थे जब यह पता चला होगा तो उन महोदय पर क्या बीती होगी? इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. बहरहाल यह घर-घर की कहानी है जो कहीं न कहीं दोहरायी जाती है. अक्सर परिवारों में यह होता है किन्तु इसका खामियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ता है. पति-पत्नी में तो कोई गुस्से में अपने प्राण की बलि चढ़ा देता है लेकिन उन बच्चों का क्या कसूर? सवाल बहुत से खड़े होते हैं-अगर यह बच्ची या उसकी मां दोनों में से कोई भी किसी गलत हाथ में पड़ जातीं तो? पत्नी मरने का इरादा छोड़कर घर आ जाती तो संभव है फिर पति-पत्नी दोनों मिलकर बच्ची को खोजने निकलते, तब तक देर हो गई होती? रायपुर पुलिस की गश्त पर भी सवाल उठता है? शहर की सड़कों पर रात में कभी पुलिस गश्त दिखाई नहीं देती, क्राइम स्क्वाड की गाड़ियां कहां है? कब व किसे लेकर कहां घूमती रहती है? हम डिजिटल इंडिया, वाय-फाय की बात करते हैं, सड़कों पर सीसीटीवी क्यों नहीं? कई मार्गों, गलियों यहां तक कि चौराहे भी घूप्प अंधेरा हैं, फिर कोई घटना हो जाये तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?

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उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
यहां करीब तीन दर्जन उद्योग ऐसे हैं जो चौबीसों घंटे धूल भरी आंधी उगल रहे हैंं ,जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं ह्रै. नियंत्रण है तो भी वह कुछ दिनों में छूटकर आसमान और धरती दोनों पर कब्जा कर लेते हैं.
चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग कालिख पुतवा लेत…

ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …