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सामाजिक व्यवस्था में मां,बेटी, बहन, पत्नी के रिश्तों पर ग्रहण-दुुष्ट कहर ढाने लगे...!


सामाजिक व्यवस्था में मां,बेटी,
majosep23@gmail.comबहन, पत्नी के रिश्तों पर
ग्रहण-दुुष्ट कहर ढाने लगे...!

जगल में रहने वाले जानवर भी वह कृत्य नहीं करते जो आज इंसान करने लगा है. एक उनतीस साल के लड़के ने अपनी साठ वर्षीय मां को भी नहीं बख्शा उसने उनके साथ बलात्कार किया. यह घटना है उस गुजरात की जहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ,लौह पुरूष सरदार पटेल जैसी हस्तियों का जन्म हुआ और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री हुए.जिस व्यक्ति ने यह कृत्य किया वह हालाकि गिरफतार कर लिया गया है किन्तु यह इंसान कहलाने लायक भी नहीं है. हैवानियत का नंगा खेल अब हमारे देश में एक प्रवृति बनती जा रही है जिसपर  कानून के लचीलेपन व निकम्मेपन ने हिम्मत देने का काम किया है. साठ सत्तर साल की वृद्वा और दो-तीन साल की बच्चियों तक को  इस एक अरब तीस करोड़ की आबादी वाले देश में चंद हवसी राक्षस अपनी वासना का शिकार बना रहे हैं और हमारा कानून बेबस अदालतों में इन राक्षसों के बचाव  में बहस कर उन्हें प्रोत्साहित कर रहा है. इस बड़ी आबादी का एक छोटा सा वर्ग अगर अपराधी, दरिन्दा और राक्षसी प्रवृति का है तो उसे फांसी के झूले पर लटका दिया जाये तो हमारी कौनसी मानवता नष्ट हो जायेगी?और किसे इसका नुकसान होगा? इस एक कृत्य से कम से कम समाज से यह कोड़ तो खत्म हो जायेगा. आज की प्रमुख आपराधिक खबरों में सागर की एक बारह साल की  बच्ची का भी है जिसे चौदह साल के दो लड़कों ने बंधक बनाकर उसके साथ दो दिन तक रेप किया. बच्ची के हाथ पैर बांधकर उसे बाथरूम में बधंक बना रखा था. कोई भी इस घटना को सुनकर यही कहेगा कि ऐसे दुष्ट अपनी मां की कोख में ही क्यों नहीं मर गये? वास्तव में समाज किस ओर जा रहा है यह अब विद्वानों, कानूनविदो और समाज शास्त्रियो तथा मानवता की वकालत करने वालों को सोचना पड़ेगा कि ऐसे मामलों में उसे क्या करना है? सरकार  को भी चाहिये कि वह महिलाओं पर विशेषकर बच्चियों व वृद्व महिलाओं पर अत्याचार करने वालों के खिलाफ ऐसा कानून बनाये कि समाज में संदेश जाये कि दूसरा कोई ऐसा कृत्य करने की हिम्मत ही न कर सके. बच्ची के साथ दो दिन तक बंधक बनाकर रेप करने वाले दोनो आरोपी भले ही बालिग नहीं है किन्तु बालिग से भी बदतर जुर्म उन्होंने किया वे इतना सोचने की ताकत तो रखते हैं कि उन्हें इसकी क्या सजा  मिल सकती है फिर भी आगे ऐसे लोगो को हमारा कानून कई बहाने बनाकर खुला छोड़ देगा ,इस प्रवृति को रोकने की जरूरत है, जब तक कठोर से कठोर सजा और तुरन्त सजा का प्रावधान नहीं किया जायेगा ऐसी और उससे क्रूरतम घटनाएं होती रहेगी.यूं तो बहुत सी ऐसी घटनाएं  हो रही है किन्तु एक वीभत्स घटना कल यूपी में हुई है जहां एक विवाहिता को एक तरफा प्यार  में पागल होकर एक व्यक्ति ने उसके प्रायवेट पार्ट को गोदकर उसकी हत्या कर दी. ऐेसे वीभत्सतम मामलों में आरोपी को सजा देन में सरकार ढिलाई करेगा और देरी करेगा तो स्वाभाविक है समाज में आगे आने वाले दिनो में लोग मां,बेटी, बहन,पत्नी  के रिश्तो को भूल जायेंगे और सामाजिक व्यवस्था एक नारकीय व्यवस्था में बदल जायेगी.

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उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

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रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …