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अरूणा की सांसें बयालीस साल बाद रूकीं... आज सड़क पर चलने वाली हर महिला उसी की तरह मुसीबत में!


अरूणा की सांसें बयालीस साल बाद
रूकीं... आज सड़क पर चलने
वाली हर महिला उसी की तरह मुसीबत में!

'दुबई भी हमारे जैसा एक देश है, वहां एक तो चोरी नहीं होती दूसरी महिलाएं बेधड़क होकर किसी भी समय सड़कों पर घूमती हैं, उन्हें किसी प्रकार का कोई खतरा नहींÓ अगर किसी ने महिला से छेड़छाड़ की तो उसकी सजा भी इतनी कठोर होती है कि लोगों की रूह कांप जाये. हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव के दौरान महिलाओं की सुरक्षा के बहुत से वादे किये थे-कुछ कानूनों में बदलाव भी हुए लेकिन अभी भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. सड़कों पर एक खौफ बना रहता है कि कब किसके साथ क्या हो जाये. कानून इतना लचीला है कि अपराध करने वाला पांच-सात साल की सजा भुगतने के बाद छुट्टा घूमता है और पीड़िता जिंदगीभर का दर्द झेलती है. मुम्बई की नर्स अरूणा शानबाग बयालीस वर्षों तक ऐसे ही मंजर से गुजरकर इस सोमवार को दुनिया से रूखसत कर गईं. लेकिन उसको इस हालत में पहुंचाने वाला वार्ड ब्वॉय सिर्फ सात साल सलाखों के पीछे रहने के बाद आज किसी छद्म नाम से हंसी-खुशी की जिंदगी बसर कर रहा होगा. अरूणा की कहानी जो भी सुनता है उसकी रूह कांप जाती हैं, आंखों से आंसू टपक पड़ते हैं और आक्रोश से मन ही मन कुड़कुड़ाता भी है कि कहीं वह व्यक्ति मेरे हाथ आ जाये तो उसे कच्चा चबा डालूं, लेकिन यह भी हमारा कानून हमें करने की इजाजत नहीं देता, किन्तु हमारी सरकार जिसके हाथ में पूरा कानून व न्याय व्यवस्था है उसके दिल में क्योंं नहीं दर्द भरता? क्यों नहीं ऐसी घटनाएं सुन उसकी आंखें अश्रु से भर जाती? क्यों हम मनुष्य का मनुष्य के ऊपर हो रहे इस अत्याचार को आंख मंूदकर देखने के लिये बाध्य हैं? हाल ही नरेन्द्र मोदी सरकार ने निर्भया कांड के बाद नाबालिग अपराधियों के द्वारा किये जाने वाले जघन्य अपराध को भी बालिग द्वारा किये गये अपराध के बराबर कर दिया, किन्तु अब भी बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें न केवल कानून में बदलाव करने की जरूरत है बल्कि उसे इतना कड़ा करने की जरूरत है जिससे अपराधी ऐसा कृत्य करने से पहले दस बार सोचे कि उसका अंजाम क्या होगा? जब तक हम जघन्य अपराधों, विशेषकर महिलाओं के प्रति होने वाले कृत्यों में ठोस व सख्त कदम नहीं उठायेंगे क्रिमिनल के हौसलों में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं आयेगी. महिलाओं पर तेजाब हमले, यौन प्रताड़ना, रेप और न जाने कैसे-कैसे अपराध एड्स और इबोला बीमारी से भी खतरनाक ढंग से फैल रहा है इसे रोकने का प्रयास किसी भी स्तर पर नहीं हो रहा बल्कि इसे बढ़ावा देने का उपक्रम कुछ वर्गों द्वारा किया जा रहा है. पीड़ादायक कुछ मामलों में तड़प-तड़पकर लोगों को मरने देने की जगह इच्छा मृत्यु की इजाजत देने में भी कोई हर्ज नहीं होना चाहिये. इस मामले में भी अरूणा की तरफ से इच्छा मृत्यु मांगी गई थी किन्तु कोर्ट से अस्वीकार कर दिया

गया. किंग एडवर्ड मेमोरियल की नर्स अरूणा शानबाग बयालीस साल इसलिये कोमा में रही चूंकि उसके सहकर्मी ने उसे कुत्ते की  चैन से बांधकर उसके साथ दुष्कर्म करने का प्रयास किया था तथा इस आपाधापी में उसकी नसों से दिमाग तक खून और ऑक्सीजन जाना बंद हो गया और वह कोमा में चली गई. इस दुष्कृत्य का आरोपी सात साल सजा भुगतने के बाद अब आजाद है लेकिन अरूणा ने बयालीस साल मर-मरके बिताये और सन् 2015 मई की अठारह तारीख को उसने दम तोड़ दिया... सरकार को सोचना चाहिये कि वह  ऐसे संगीन मामलों में क्या कठोर कदम उठा सकती है, जिससे कभी  कोई दूसरी अरूणा किसी दरिन्दे के फंदे में न फंसे.

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ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …