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ब्लड पे्रशर बढ़ाने वाला बिजली बिल अब लोगों के हार्ट पर भी आघात करने लगा!


ब्लड पे्रशर बढ़ाने वाला बिजली
बिल अब लोगों के हार्ट
पर भी आघात करने लगा!
एक फुट दो इंच लम्बा होता है छत्तीसगढ़ के सीपीडीसीएल (छत्तीसगढ़ विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड) का बिल! जो हर महीने उपभोक्ताओं को आन द स्पॉट परोसा जाता है. इसको देखने के बाद कइयों का ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है तो कइयों के दिल की धड़कन रूक जाती है. कई इस चिंता में खो जाते हैं कि आखिर इस बिल को पटाने के बाद मेरे परिवार का क्या होगा? कैसे बच्चे की फीस पटाई जायेगी, कैसे घर का किराया अदा किया जायेगा और कैसे बाबूजी के लिये दवा का प्रबंध किया जायेगा? क्या आप उपभोक्ताओं में से कोई सीपीडीसीएल द्वारा जारी किये जाने वाले बिल में से शुद्ध देयक और सकल देयक के अलावा आपसे वसूल किये जा रहे किसी बिन्दू का सही विश्लेषण कर सकता है? बिल उपभोक्ता को देने का पूरा तरीका तानाशाही, लालफीताशाही से भरपूर और त्रुटिपूर्ण रहता है जिसको विद्युत कंपनी का कोई अधिकारी अथवा इसे बनाने वाला कर्मचारी ही समझ सकता है. आम उपभोक्ताओं के लिये मुसीबत बना यह बिल आगे के दिनों में और आप सभी के लिये और मुसीबत बन सकता है, चूंकि कंपनी ने तय कर लिया है कि वह अपने उपभोक्ताओं को और निचोड़कर ही दम लेगी. आप इतना पैसा अदा नहीं कर सकेंगे- आप उनसे इस बढ़ोतरी का कारण पूछने उनके दफ्तर भी  पहुंच सकते हैं, आपको वे सिर्फ यह कहकर समझायेेंगे कि बिल बढ़ गया है लेकिन आपको बिल में लिखी उन बातों को कोई नहीं समझा पायेगा कि अनाप-शनाप पैसा क्यों वसूला जा रहा है? आपके एक फुट दो इंच लंबे बिल में लिखा उर्जा प्रभार क्या है? विद्युत शुल्क क्या है? उर्जा विकास उपकर क्या है? मीटर किराया क्यों बार-बार लिया जा रहा है? पावर फैक्टर अधिभार रियायत क्यों नहीं दी जा रही? पेनाल्टी, अति. शुल्क, डीएल समायोजन, अति. सुरक्षा निधि, बीसीए क्या है और सुरक्षा निधि बकाया के नाम से हर बिल में राशि क्यों ली जा रही है तथा कब तक यह बकाया राशि आम उपभोक्ताओं को देते रहनी पड़ेगी? जब कोई उपभोक्ता इंटरनेट से आपकी पाई-पाई पटा देता है तो उससे पूर्व बकाया के नाम से वसूली क्यों की जाती है? अन्य प्रभार के नाम से भी हम उपभोक्ताओं से कुछ पैसे  ही सही काटा जाता है? अगर आप एक रुपये देते हैं तो विद्युत कंपनी हम सारे लोगों से यूं लाखों रुपये अपने खजाने में भरती है. कंपनी का यह बिल हर महीने के शुरू में बनना शुरू होता है जिसे महीने के 20 या 23 तारीख को उस समय पटाना पड़ता है जब प्राय: हर व्यक्ति की जेब खाली हो जाती है. नहीं पटाने पर कपंनी के लोग आपकी लाइन काटने के लिये चार आदमियों की सीढ़ी लेकर भेज देते हंै- फिर इसके बाद आपके घर में चूल्हा जले या न जले, बच्चा गर्मी से रोता रहे- उन्हें अपना पैसा वसूलने के सिवा कुछ नजर नहीं आता. विद्युत कंपनी के हर माह परोसे जाने वाले एक फुट दो इंच लम्बे बिल से बड़े अमीर उपभोक्त ाओं को भले ही कोई फरक नहीं पड़ता, लेकिन यह बिल मध्यम व गरीब उपभोक्ताओं के समक्ष गंभीर सवाल खड़ा करता है कि वे घर को रौशन करने के लिये यूं कब तक विद्युत कंपनी को आबाद करते रहेंगे?

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उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

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काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
यहां करीब तीन दर्जन उद्योग ऐसे हैं जो चौबीसों घंटे धूल भरी आंधी उगल रहे हैंं ,जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं ह्रै. नियंत्रण है तो भी वह कुछ दिनों में छूटकर आसमान और धरती दोनों पर कब्जा कर लेते हैं.
चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग कालिख पुतवा लेत…

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ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …