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शाबाश बेटियों...तुम्हारी जागृता ही समाज को राह दिखायेगी, शराब, जुएं से मुक्ति दिलाने अभी और कठोर बनना होगा!


शाबाश बेटियों...तुम्हारी जागृता ही समाज
को राह दिखायेगी, शराब, जुएं से
मुक्ति दिलाने अभी और कठोर बनना होगा!

कहते हैं पूत के पांव पालने में ही दिखाई देने लगते हैं- इस कहावत में जहां हकीकत है वहीं अब आजकल की बेटियों को कपूत के पांव शादी की दहलीज पर ही दिखाई देने लगे हैं- इससे एक अ'छी बात यह होगी कि भविष्य में गृह कलह, तलाक, दहेज हत्या, आत्महत्या और अन्य बुराइयों से बेटियां बच सकें गी. छत्तीसगढ़ की उर्मिला, रेखा जैसी बेटियों ने जो मिसाल कायम की है वह अन्य उन लड़कियों के लिये भी प्रेरणादायक है जो किसी युवक के साथ अपना जीवन संवारने की तैयारी में हैं. छत्तीसगढ़ में इस दो महीने के अंतराल में चार बेटियों ने अपने घर की दहलीज तक पहुंचे दुल्हे को शराब के कारण वापस भेज चुकी हैं. यह उस समाज के लिये एक संदेश है जो खुशियां मनाने के लिये शराब को अपना साथी चुनते हैं. वैवाहिक जीवन का शुरूआती दौर आनंददायक है, लेकिन उसमें दरार तब पड़ जाती है जब पता चलता है कि युवक या युवती दोनों में से कोई एक आशा, प्रत्याशा के अनुरूप नहीं बैठता, मसलन पुरुष शराबी है, गे है अथवा लड़की के चरित्र में खामियां है, सारी बातें पहले से ही देख-परख कर पुख्ता कर लिया जाये तो जीवन खुशहाल और दाम्पत्य जीवन सुखी हो जाता है. अभी दो रोज पहले ही एक दूल्हे से दुल्हन ने शादी से इसलिये इंकार किया चूंकि उसे रुपये तक गिनना नहीं आता था. दूल्हे ने अपने आपको शिक्षित बताया था, उसकी पोल स्वयं दुल्हन ने खोल दी और वह खाली हाथ घर लौट गया. एक अन्य गंभीर घटना एक महिला चिकित्सक के साथ हुई उसने इसलिये आत्महत्या कर ली चूंकि उसका पति गे अर्थात समलैंगिक था-इसके बावजूद महिला वैवाहिक संबंध में पांच साल तक बंधी रही और अंतत: तंग आकर उसने अपने आपको खत्म कर लिया. हालांकि ऐसे संबंधों की नौबत का प्रतिशत बहुत कम है लेकिन शराब से घर को तबाह करने वालों का प्रतिशत तो इतना Óयादा है कि वह भारत जैसे गरीब देश में कई परिवारों को बरबाद कर रहा है. शादी के समारोह में कहीं मारपीट हो रही है तो कहीं गोली चल रही है, ऐसे में अगर कोई महिला एहतियाती व ऐतिहासिक कदम उठाती है तो यह अपने आप में साहसिक है, वह भी उस देश में जहां परंपराएं, संस्कृति, धर्म, समाज आदि का रोना दिखावे के रूप में खूब रोया जाता है. बेटियों के इस साहसिक कदम की जितनी तारीफ की जाये कम है. यह समाज के ही बस का काम है कि वह शराब की बुराई को जड़ से उखाड़ फेंके-विवाह समारोह में पूर्ण रूप से नशे, जुएं को रोके और ऐसे लोगों को अपनी बेटियों से बचाये जो चिकनी-चुपड़ी बातों से आपकी लाडली को नरक में ले जाये. हमें उम्मीद है कि सर्वसमाज के ठेकेदार एवं धनाड्य वर्ग जो शराब सेवन व जुएं को विवाह और अन्य खुशियों के अवसर पर महान पवित्र कार्य समझते हैं वे इसके
दुष्परिणाम से सबक लेंगे तथा विकराल रूप से पनपती इस बुराई पर अंकुश लगाने के लिये स्वयं पहल करेंगे. सरकार का भी ध्यान इस ओर दिलाना चाहते हैं कि शराब मुक्ति के नारे से बस काम नहीं चलेगा। वे इस ओर कठोर कानून बनाए और शराब व्यवसाय को समाप्त करने की योजना बनाए। इसके साथ ही ऐसी बेटियों का सम्मान भी करें जो समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ सख्ती से खड़ी होकर अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं।

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रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
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