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कब मिलेगा हर आदमी को समान अधिकार, कब अंत होगा अंग्रेजों की बनाई गई परंपरागत व्यवस्था का?

हम जानते हैं कि संविधान में लिखे गये कुछ अंशों को आसानी से बदला नहीं जा सकता लेकिन यह भी तो सत्य है कि हमने जिस संविधान की रचना की है उसमें लिखी बातों को जो हमें अच्छी नहीं लगती बदल देना चाहिये. स्वतंत्रता के सडसठ सालों बाद भी हम अंग्रेजों के बनाये नियमों और उनकी गलतियों को न केवल अंगीकार कर रहे हैं बल्कि कुछ लोगों को देश के गरीब, मध्यमवर्ग और अमीर की माली हालत के विपरीत अंग्रेजों के समय के ठाठ बाट और ऐशोआराम की जिंदगी में जीने का मौका भी प्रदान कर रहे हैं. बात अगर देश में लोकतांत्रिक प्रणाली से शुरू करें तो यहंा जनता द्वारा निर्वाचित प्रधानमंत्री और उसके मंत्रिमंडल को कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के पूरे अधिकार है. इसी प्रकार राज्यों में मुख्यमंत्री और उसके मंत्रिमंडल को भी उसी प्रकार के अधिकार है जैसा केन्द्र में प्रधानमंत्री और उसके मंत्रिमंडल को हैं.देश की न्यायव्यवस्था को चलाने के लिये उसकी न्यायपालिका है जो संपूर्ण देश व प्रदेश में न्यायिक मामलों का समय पर निर्वहन करती है. अब सवाल उठता है इस गरीब देश में मौजूद व हमारे द्वारा अंग्रेेजों के समय प्रदत्त उन संवैधानिक पदों के बारे में जो सिवाय फिजूल खर्ची के ओर कुछ नहीं लगता, मसलन जब देश में राष्ट्रपति प्रणाली नहीं है तो राष्ट्रपति और राज्यों में गवर्नर या राज्यपाल के पदों और उनपर खर्च करने का औचित्य?.राष्ट्रपति को मासिक तनखाह 1.50 लाख जबकि गवर्नर को एक लाख दस हजार रूपये प्रतिमाह तथा उनके रहन सहन. सुरक्षा आदि पर लाखों रूपये का व्यय होता है.इतिहास पर एक नजर डाले तो अंग्रेजों ने भारत में अपनी हुकूमत को मजबूत करने के लिये यहां वायसराय और गवर्नर की नियुक्तियां की थी तथा उन्हें बड़े बड़े महल व सैकड़ों लोगों को उनकी सेवा में लगाया था.सन् 1900 में भारतीयों में लोकतंत्र का जज्बा जागा तो वे अपने प्रतिनिधियों को चुनने लगे और इन वायसरायों और गवर्नरो ंके पास अपने क्षेत्र की स्वास्थ्य तथा शिक्षा संबन्धी समस्याओं को लेकर पहुंचने लगे.हम प्रजातांत्रिक ढंग से अपने प्रतिनिधियों का तो चुनाव करते लेकिन समस्याओं के निदान का अधिकार महलों या पेलेस में रहने वाले वाइसराय और गवर्नर के पास ही केन्द्रित रहता था. इन महलों व पेलेस में रहने वालों की राजशाही, ठाठबांठ विलासिता सब देखने लायक रहती थी. क्या हम अंग्रेजों के बनाई उस व्यवस्था को आज भी राष्ट्रपति और गवर्नर के रूप में जारी रखे हुए नहीं हैं? जबकि आज हमारे पास अपना प्रधानमंत्री, अपना न्यायाधीश, अपना मुख्यमंत्री सबकुछ है तब ऐसी व्यवस्था को कायम रखने की क्या जरूरत? जिसमें हम अपने टैक्स का करोड़ों रूपये सिर्फ एक व्यक्ति की शानोशौकत और अपना अहम और अहंकार बनायें रखने के लिये खर्च कर रहे हैं. एक तरफ देश का वह गरीब है जिसके पास सर छिपाने के लिये आज भी झोपड़ पटिटयों के सिवा कुछ नहीं हैं और दूसरी तरफ हम ऐसी व्यवस्था पर उन्हीें लोगों से टैक्स वसूल कर करोडा़ें रूपये अपने द्वारा बनाई गई व्यवस्था की गद्दी पर खर्च कर रहे है जहां सिर्फ एक व्यक्ति निवास करता है और ढेरों नौकर चाकर, सुरक्षा कर्मचारी मुधमक्खी के छत्ते की तरह तीमारदारी में लगे हुए हैं. अंग्रेजों व राजा महाराजाओं के महलों में हम गुलामी के समय भी घुस नहीं पाते थे लेकिन आज तो हम आजाद है यहां तो हमारा अब भी जाना वर्जित है. गवर्नर के पदों पर राजनीति से रिटायर व्यक्ति को राजनीतिक दल अपने व्यक्ति को खुश करने के लिये नियुक्त करती है जब उस राजनीतिक दल का कार्यकाल खत्म हो जाता है तो दूसरे की नियुक्ति कर दी जाती है. जब किसी नई सरकार को शपथ दिलाने के लिये केन्द्र व राज्यो मेंं मुख्य न्यायाधीश जैसा महत्वपूर्ण पद मौजूद है तब ऐसा एक और राजनीतिक पद बनाकर रखने का औचित्य आज तक कोई समझ नहीं पा रहा है क्या यह इस गरीब देश की जनता के पैसे की बर्बादी नहीं है? हम मानते हैं कि इस व्यवस्था को बदलने का कार्य राजनीतिक दल और उनकी सरकारें नहीं कर सकती किन्तु सवाल यह भी उठता है कि आखिर किसी न किसी को तो इसके लिये आगे आना होगा जो पुरानी परंपराओं का अंत करें और देश में हर आदमी को समान अधिकार प्रदान करें जो हमारे संविधान में लिखा है.

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