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कब तक यात्री रेलवे के अत्याचारों को सहेगा?


कब तक यात्री रेलवे के  अत्याचारों को सहेगा?

प्लेन में खराबी आ जाये तो संबन्धित एयर लाइंस अपने यात्रियों को किसी बड़े होटल में ठहराकर उनकी सेवा में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ती लेकिन क्या देश की सबसे ज्यादा कमाऊपूत रेलवे अपने यात्रियों की सेवा इसी प्रकार करती है? इस प्रकार नहीं तो भी क्या वह अपने उन यात्रियों की कोई खैर खबर लेती है जिनसे वह लम्बी यात्रा के नाम पर अनाप शनाप रेट वसूल करती है. शुक्रवार और शनिवार की दरम्यिानी रात बैतूल के समीप एक मालगाड़ी दुर्घटना के बाद जो अनुभव इस रूट के लाखों यात्रियों को करना पड़ा वह अभूतपूर्व था हालाकि ऐसी दुर्घटनाएं अक्सर होती है तथा यात्री इस तरह की मुसीबतें झेलते हैं लेकिन गर्मी के दिनों में जो कठिनाई होती है वह किसी जेल में एक दिन की सजा से कम नहीं है. शुक्रवार रात करीब 10-11  बजे के आसपास  बेतूल के पास घोडाडोगरी रेलवे स्टेशन के बिल्कुल करीब एक कोयले से भरी मालगाड़ी जो सारिणी संयत्र के लिये कोयले लेकर जा रही थी खूब तेज गति से पटरी से उतरकर विद्युत खम्बों को तोडते हुए बुरी तरह दुर्घटनग्रस्त हो गई.संपूर्ण रेलवे लाइन पर चलने वाले इलेक्ट्रिक इंजन की रेलगाड़यां जहां थी वही खड़ी हो गई विद्युत आपूर्ती लडखड़ाने से सिग्नलों ने भी काम करना बंद कर दिया और भी कई मुसीबतें इन प्रभावित ट्रेनों में सवार लोगों के समक्ष आन पड़ी. कई गाडियों की एसी बंद हो गई. ट्रेन के जनरेटरों से कुछ समय तक तो लाइट व एसी चले किन्तु वह भी बाद में बंद हो गई. एक तरह से सारी ट्रेनों में अव्यवस्था फैल गई. ट्रेनों में मौजूद रेलवे के किसी कर्मचारी को यह नहीं मालूम था कि आखिर क्या हुआ. बहरहाल ट्रेने जैसी थी उसी हाल में सात से आठ घंटे तक इस भीषण गर्मी में यात्रियों से ठसाठस भरी हालत में यूं ही खड़ी रही. ट्रेनों में पानी खत्म हो चुका था तथा बच्चे मारे गर्मी के चीख पुकार कर रहे थे. यात्रियों से मनमाना पैसा वसूल करने वाले रेलवे को इसकी कोई चिंता नहीं थी. कहीं कोई अनाउंसमेंट भी नहीं किया गया कि आगे कब उन्हें राहत मिलेगी. कुछ ट्रेने तो ऐसे जंगलों में खड़ी थी जहां यात्रियों के सिवा कोई दूसरा इंसान नजर नहीं आता था. ऐसे हालत में रेलवे ने यात्रियों को राहत दिलाने के लिये बस इतना किया कि इलेक्ट्रिक  इंजनों की जगह डीजल इंजनों की व्यवस्था कर दूर दराज क्षेत्रों में खड़ी ट्रेनों को उन स्थानों से निकालकर दुुर्घटनास्थल से निकालने में मदद पहुंचाई लेकिन इस कार्य में भी करीब छै सात घंटे का समय लगा. ट्रेनों में सवार यात्रियों को खाने- पीने की राहत पहुंचाने का प्रबंध रेलवे ने नहीं किया जबकि यात्री जिन्हे अपने गंतव्य तक की यात्रा करने में जहां बारह घंटे का समय लगता था वह उन्होंने चौबीस और छत्तीस घंटों में पूरा किया. सवाल यह उठता है कि जिसप्रकार रेलवे किसी भी दुर्घटना के लिये राहत दल और राहत के लिये लगने वाली ट्रेन तथा मशीने तैयार रखता है उसी प्रकार वह ट्रेनों में यात्रा कर रहे उन यात्रियों को राहत पहुंचाने के लिये ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं करता ?क्यों उन्हें घंटों भूखे प्यासे एक ही स्थान पर पड़े रहने के लिये मजबूर करता है?मालगाड़ी की जगह यात्री ट्रेनों के दुर्घटनाग्रस्त होने पर रेलवे के पास अपनी संपत्ती की रक्षा करने की तो तैयारी है लेकिन यात्रियों को राहत पहुंचाने की कोई व्यवस्था आज तक नहीं की. शुक्रवार की घटना के बाद खड़ी यात्री गाड़ियों में कई ऐसे पेशेटं थे जो हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज से पीड़ित थे उन्हें भी रेलवे ने भगवान भरोसे छोड़ दिया. यह यात्रियों की भी गलती है कि वह भी  रेलवे के इस अत्याचार को शांत दिल से बर्दाश्त कर लेता है.

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