सवाल स्मृति की शिक्षा का या संवैधानिक त्रुटि का?


सवाल स्मृति की शिक्षा का या संवैधानिक त्रुटि का?

''पढ़ोगे लिखोगे बनागे नवाब,
खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब
जो बच्चे कभी लिखते पढ़ते नहीं,
वो इज्जत की सीड़ी पर चढ़ते नहीं,
यही दिन है पढ़ने के पढ़ लो किताब
बुराई  के रास्ते से बचके चला
कभी न झूठ बोलों न चोरी करोÓÓ
हमें बचपन से यही गीत गाकर पढ़ाया लिखाया गया है.हम यही सुनते आये है लेकिन ''अगर काम से ही किसी का मूल्याकंन करना है तो देश के युवाओं को अब डिग्री लेने की जरूरत नहींÓÓ-स्मृति इरानी की माने तो कुछ ऐसा ही संकेत मिलता है. नरेन्द्र मोदी मंत्रिमंडल  में मानव संसाधन  मंत्री जैसा महत्वपूर्ण सम्हालने वाली कम उम्र की मंत्री,जिन्हें देश की उच्च शिक्षा, जाँब,शिक्षा में एफडीआई, आईआरटी, आईबाईएम, एम्स, स्किल डेवलपमेंट, युवाओं की उम्मीदो और  बेसिक शिक्षा  के दायित्वों को पूरा करना है,वे सिर्फ बारहवीं कक्षा पास है. उनका कहना हैै कि उनके पास  तजुर्बा है और उसी को रखकर देश की शिक्षा नीति और उससे संबन्धित अन्य कार्यो को तय करेंगी.  स्मृति अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव  हार  गई, राहुल गांधी जैसे कांग्रेस के बड़े नेता को हराना उनकी दूसरी योग्यता है. इस पूरे मामले पर  देशभर में गंभीर बहस छिड़ी हुई है.कहा यह भी  जा रहा है कि उन्होंने सन् 2009 के चुनाव में जो शैक्षणिक योग्यता पेश की थी वह 2014 में बदल  दी गई. बहराहल हम इस मुद्दे पर न  जाकर उस संवैधानिक व्यवस्था की ओर जाना चाहते हैं जो इस संबन्ध में मौन है. मंत्री बनने के लिये कोई शैक्षणिक योग्यता को मापदण्ड नहीं बनाया गया है.अत: स्मृति इरानी चुनाव हारकर आई या जीतकर अथवा उन्होंने कितनी  शैक्षणिक योग्यता अर्जित की, इसे दरकिनार रख उन्हें जब इस पद पर रख ही दिया है तो कार्य करने  का मौका रहने देते हुए उनके कार्यो का मूल्यांकन करना चाहिय,े उसके बाद ही वे  इस पद के लायक है या  नहीं इसपर कोईनिर्णय लिया जाना चाहिये. वैसे हमे कोई  नौकरी पर लगाता है तो वह हमारी योग्यता परखता है-हम कहां तक पड़े हैं.हमारा एक्सपीरियेन्स क्या है? हमने कहां कहां काम किया है? आदि कई झमेलों और एफडेबिट भरने  के बाद हम नौकरी पर लगते हैं. कई लोगो की लाइन में से हमें छांटकर अपायनमेंट दिया जाता है फिर देश को चलांने वाले विधायक, सासंद और मंत्री के मामले में ऐसा क्यों नहींं? मंत्रियों में कई अनपढ़ और अंगूठा छाप भी देश को चला चुके हैं.संविधान में ऐसा कहीं लिखा भी नहीं है कि कोई अंगूठा छाप देश को नहीं चला सकता. यह भी नहीं लिखा कि मंत्री पद सम्हालने के लिये योग्यता क्या होनी चाहिये?मोदी  सरकार में मानव संसाधन मंत्री पद पर स्मृति इरानी को नियुक्त करने के बाद यह सवाल उठ खड़ा  हुआ है कि आखिर  ऐसा क्यों हुआ? लालू प्रसाद हो या मायावती इनको लोगों ने हमेशा हंसी का पात्र बनाया किन्तु उनकी  राजनीतिक योग्यता के साथ शैक्षणिक योग्यता भी कम नहीं थी. लालू प्रसाद यादव जहां बीए एलएलबी हैं तो मायवती बीए साथ  ही वे एक शिक्षिका के तौर पर भी काम कर चुकी है.नरेन्द्र मोदी  मंत्रिमंडल में स्मृति इरानी  से कम शैक्षणिक योग्यता वाले कई और सदस्य है किन्तु इनको दिये गये मंत्रीपद पर कहीं कोई आपत्ति किसी स्तर पर नहीं उठाई गई शायद  इसलिये भी कि मानवसंसाधन विभाग का देशव्यापी महत्व होने के साथ व्यक्ति के जीवन निर्माण में भी इस विभाग का महत्व अन्य विभागों की बनस्बत ज्यादा  है इसलिये भी शायद  इस पर  विवाद उठा.इस मामले में कश्मीर  के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्मृति इरानी का हालाकि बचाव करते हुए जो  बात कही वह भी  कम महत्वपूर्ण नहीं.उन्होंने कहा था कि ऐसे मे तो सिविल एविएशन का मिनिस्टर किसी पायलेट को बनाना चाहिये. यह बात उन्होंने उनके पक्ष में जरूर कही है किन्तु वास्तव में क्या ऐसा ही नहीं  होना चाहिये ?अगर सिविल एविएशन का काम किसी पायलेट या उस विभाग से सबंन्धित लोगों को दिया जाये तो क्या इस विभाग का काम और अच्छे से नहीं चल सकेगा? मोदी मंत्रिमंडल मे सेना को अच्छी  तरह से जानने वाले वीके सिंह मौजूद है-रक्षा मंत्री का दायित्व उन्हें नहीं दिया जा सकता था?ठीक इसी  तरह पूर्व शिक्षा मंत्री  मुरली  मनोहर जोशी  भी तो जीते हुए शिक्षा से जुड़े व्यक्ति हैं? क्या उन्हें मानवसंसाधन  विभाग नहीं दिया  जा सकता था? ऐसे बहुत से सवाल  कुरेदों तो निकल सकते हैं लेकिन हमारी संवैधानिक व्यवस्था में बहुत सी खामियां हैं जिसे पहले हल करने की जरूरत है.मंत्री  कैसा हो, कितना पड़ा लिखा हो, उसकी शैक्षणिक योग्यता, सामाजिक स्टेटस, उसका क्रिमिनल रिकार्ड, व अन्य आवश्यक आर्हताएं क्या- क्या हो यह सब तय होना चाहिये था. अगर ऐसा होता तो शायद ऐसे मामले उठते ही नहीं. एक आदमी चुनाव लड़ता  है दूसरा,तीसरा चौथा व अन्य उसे वोट देते हैं किन्तु इन सभी  को किस तरह की योग्यता वोट देने और लेने दोनों में होनी चाहिये, यह कहीं तय नहीं किया गया. वोट देने व लेने दोनों ही व्यक्ति की भी सारी शैक्षणिक,सामाजिक ,राजनैतिक स्टेटस के साथ साथ उसका क्रिमिनल  रिकार्ड व मानसिक स्थिति क्या है, यह तक तय होना चाहिये तभी चलकर हमें एक स्वस्थ और निष्पक्ष, साफसुथरा सही लोकतंत्र प्राप्त होगा.

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