मौसम पर वैज्ञानिक कितने सटीक,फंसते तो किसान हैं!


मौसम पर वैज्ञानिक कितने
सटीक,फंसते तो किसान हैं!

मौसम का मिजाज कब बिगड़ जाये यह कोई नहीं जानता.हम बुधवार की रात सोने की तैयारी कर रहे थे तभी धरती अचानक हिल गई. ऐसा छत्तीसगढ़ में करीब तीस साल पहले भी हुआ था किन्तु समय में फरक था, उस समय सुबह चार बजे के आसपास धरती हिली लेकिन इस बार यह शाम को नौ साढ़े नौ बजे के आसपास हुआ. रायपुर में बहुत कम लोगों को इसका अहसास हुआ किन्तु ऐसे किसी भूकम्प की भविष्यवाणी किसी माध्यम से नहीं की गई, हां धरती हिलने के बाद यह बताने में कोई कमी नहीं की गई कि देश में कहीं भी धरती हिले मगर छत्तीसगढ़ में ऐसा कभी नहीं होगा बहरहाल ऐसे बहुत से मामले हैं जो मौसम विज्ञानियों की भविष्यवाणियों को झुठला देते हैं. सुबह से दोपहर तक खूब गर्मी पड़ती है और शाम होते ही जैसे किसी हंसते खेलते व्यक्ति का मूड बदल जाता है, उसी प्रकार तेज आंधी चलती है तूफान आता है और सब तबाह हो जाता है. अरबों रूपयें के मौसम की जानकारी के लिये संयत्र देश में लगे है लेकिन सटीक जानकारी न भारत के इन संयत्रों और इसमें तैनात विशेषज्ञों के पास है और न ही दूर सात समुन्द्र पार बैैठे महान वैज्ञानिक होने का दावा करने वाले अमरीका के पास क्योंकि वह खुद भी अचानक मौसम में आए बदलाव की तबाहियों का गवाह बनता है. सब दावे उस समय बेकार साबित हो जाते हैं जब इस बात की कोई भविष्यवाणी करें बिना या किसी के समझे बगैर अचानक कहीं जोरदार भूंकप आ जाता है तो कभी भारी गर्मी के बीच धूलभरी तूफानी हवा चलती है और कुछ ही क्षणों मेंं सब तबाह होकर शहर, कस्बे, गांव सब तबाही  का मातम मनाते हैं. वैज्ञानिक और सब मामले में दावे कर सकते हैं लेकिन प्रकृति द्वारा संचालित नियमों पर शतप्रतिशत दावा करने में वह आज तक असफल रहा हैं. अगर दावे सही होते तो न रबी की कटाई के समय बेमौसम वर्षा होती और न आंधी-तूफान से तैयार फसल को क्षति होती. देश के कई भागों में ओलावृष्टि से बहुत नुकसान हुआ इसकी भविष्यवाणी कहीं नहीं की गई कि ऐसा होगा. इस तरह के अप्रत्याशित मौसम की आशंका भविष्य में और बढ़ सकती है, ऐसा भी कहा जा रहा है. ठोस दावा नहीं,माना जा रहा है कि दुनिया पर्यावरण बदलाव के दौर में प्रवेश कर चुकी है. इस संकट को कम करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों, विशेषकर कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में तेजी से कमी लाने की बात की जा रही हैं मगर किसी को इसकी परवाह नहीं.कई जगह एसिड वर्षा इस बात का संकेत है कि आकाश मंडल  में धरती से उत्पन्न ऐसे रासायनिक गैस का जमाव ज्यादा हो गया जो समय समय पर एसिड वर्षा भी कर रहे है. यह विश्व स्तर की चुनौती है लेकिन स्थानीय स्तर पर खेती-किसानी की रक्षा इस बदलते दौर में हमें कई स्तरों पर करनी है इसके बगैर तो हमारे पेट में अन्न का एक दाना भी नहीं पहुंच पायेगा.  इस दौर में कृषि,आपदा-प्रबंधन व राहत, जल व मिट्टी संरक्षण तथा वनीकरण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. किसानों, मजदूरों और अन्य गांववासियों की आजीविका का आधार अधिक मजबूत करना होगा. खेती-किसानी में अब बदलाव ही एक विकल्प है जो मौसम के बिगड़ते मिजाज के बावजूद किसानों के जोखिम और कर्ज को न्यूनतम कर सकती है.संपूर्ण देश में फसल बीमा लागू है लेकिन यह कितने किसानों तक पहुंची है अगर फसल चक्र फेल हो रहा हों, तो किसानों को इसके विकल्प भी उपलब्ध कराने होंगे. हरित क्रांति की कोशिशों में हमने फसलों की ऐसी बहुत-सी किस्मों को भुला दिया है, जो प्रतिकूल मौसम में भी अच्छी उपज दे देती थीं.ऐसी किस्मों को फिर से फसल-चक्र में जगह देने से किसान के हितों की रक्षा संभव है और खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकती है। देश की खेती-किसानी को रासायनिक खेती से हटाकर जैविक खेती की ओर ले जाने का रास्ता साफ करने की जरूरत है.मौसम में बदलाव के परिप्रेक्ष्य में यह जरूरी हो जाता है कि आपदा-प्रबंधन और राहत के लिए पहले से ही योजनाएं बनाई जाये व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि आपदा के बाद तुरंत ही सारी चीजें अपने आप शुरू हो जाएं. देश की नदियां जहां  जोड़ी जा सकती है वहां वहां उसे जल्द जोड़ा जाये ताकि भविष्य में जल संकट की स्थिति और गंभीर न हो जाये.
  

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