सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कौन जिम्मेदार है शहर में पीलिया फैलाने के लिये?




जब प्यास लगती है, तब हम कुआं खोदते हें और जब बीमारी से मौते होने लगती है तब हमें याद आती है सफाइ!र् स्वास्थ्य कार्यक्रम! और दुनियाभर के एहतियाती कदम! राजधानी रायपुर के मोहल्लों में कम से कम तीन महीनों से पीलिया महामारी का रूप धारण किये हुए हैैं और हमने अपने इन्हीें  कालमों में यह भी बताया था कि इसके पीछे कौन से प्रमुख कारण है किन्तु किसी ने इसपर संज्ञान नहीं लिया, अब जब आज यह बीमारी संक्रामक रूप ले चुकी है और एक साथ दो-दो मौते हो चुकी है तब प्रशासन को याद आ रहा है कि हां कुछ तो करना पड़ेगा नहीं तो लोग कीड़े मकोडा़ें की तरह मरने लगेंगे. मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को भी आनन फानन में बीमारी की गंभीरता से अवगत करा दिया गया.लगातार लोगों के बीमार पड़ने के दौरान इसकी गंभीरता से अवगत कराने की जगह दो मौतों के बाद खबर उनके उत्तर प्रदेश दौरे के दौरान ही पहुंचाई गई.रविवार को एक एनआईटी छात्र और बाद में एक महिला की मौत ने संपूर्ण प्रशासन को हिलाकर रख दिया और शहर  में सनसनी व दहशत का माहौल निर्मित हो गया.अफसरों ने बीमारी की गंभीरता से तो मुख्यमंत्री को अवगत करा दिया पैसे भी स्वीकृत करा लिया लेकिन क्या एहतियातिक कदम उठाये गये? शहर आज भी गंदा है, मैला है और नालियां बदबूदार है इन्हीं नालियों के पास से लोगों के घरो के लिये नगर निगम की वे पाइप लाइनें गई हैं जिनसे लोग पीने का पानी लेते हैं. लोहे की पाइप लाइनें इतनी पुरानी  है कि इनके अंदर जंग लग चुकी है तथा इसमें कीड़ों ने अपना घर  बना लिया है. निगम शहर की नलों से पानी कम से कम दो या तीन बार खोलता है इसके बीच का समय कीडों का होता है जो नालियों  से निकलकर इन पाइप लाइनों में पहुंचते हैं. पानी चालू होते ही लोगों की भीड नलों की ओर दौड़ती है वे पानी भरते हैं साथ ही  कीडे मकोडा़ेें को भी अपने रसोई तक ले जाते हैं.पीलिया और उदर  रोग से संबन्धित अन्य बीमारियों की उत्पत्ती यहीं से होती है. निगम के एक बड़े अधिकारी रविवार को टीवी चैनल पर यह कहते हुए सुना गया कि लोगों को अपने घरों में पानी उबालकर पीना चाहिय,े आरओ लगाने की बात भी उन्होंने कहीं लेकिन कितने ऐसे लेाग हैं जो आरओ लगाने  के लिये सक्षम हैं?पानी गरमकर पीना  कहना आसान है लेकिन क्या यह भी हर समय ऐसा हो सकता है? हां हम मानते हैं कि निगम अपने ओवर हेड टैंकों से फिल्टर किया हुआ स्वच्छ पानी लोगों के घरों को भेजती है लेकिन यह भी सही है कि निगम द्वारा बिछाई गई पाइप लाइनें ही रायपुर के मोहल्लों में पीलिया फैला रही है,यह बदलने का काम उन मोहल्लों मे तो शुरू हो गया लेकिन अन्य वार्डाे का क्या  होगा? रविनगर की नालियां देखिये या सर्वोदय नगर हीरापुर की सेप्टिक  टैंक तरफ कीगलियां देखियें जहां सफाई शायद वर्षो से सफाई नहीं हुई.राजधानी रायपुऱ सहित छत्तीसगढ़ के प्राय: हर शहरों में लोगों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी राज्य सरकार सहित नगर पालिकाओं और नगर निगमों की भी है. यह संस्थाएं आम नागरिकों से इसके लिये सालाना एक मुश्त रकम वसूल करती  है. यह न पटाने पर वे घरों के सामने सफाई नहीं कराते, स्ट्रीट लाइट की सुविधा नहीं देते और नलों को काट भी देते हैं लेकिन सवाल  यह भी उठता है कि क्या नगर निगम का स्वास्थ्य व  संबन्धित अन्य विभागों का अमला कभी यह देखने का प्रयास भी करता है कि मोहल्लों या वार्डो में सफाई हो रही है या नहीं, नलों से पानी बराबर सप्लाई  की जा रही है या नहीं? वार्डो में स्ट्रीट लाइट जल रहे हैं कि नहीं?क्या कभी नगर निगम ने अपने  द्वारा सप्लाई किये जा रहे पानी को किसी के घर से सेम्पल लेकर टेस्ट किया  है?अगर हां तो बताये कितने घरों की टेस्टिगं की और क्या  निष्कर्ष निकला?बीमारी  फैलाने के लिये निगम तो जिम्मेदार है ही साथ ही शहर के लोग भी उतने ही जिम्मेदार है जो रोज हर सेके ण्ड नालियों व सड़कों में कचरा फेककर शहर को और गंदा कर रहे हैं! ऐसे लोगों पर  कार्रवाई की जिम्मेदारी भी  निगम की बनती है.यह भी बताया जाये कि कितने लोगों पर दण्डात्मक कार्रवाई की गई?

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
यहां करीब तीन दर्जन उद्योग ऐसे हैं जो चौबीसों घंटे धूल भरी आंधी उगल रहे हैंं ,जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं ह्रै. नियंत्रण है तो भी वह कुछ दिनों में छूटकर आसमान और धरती दोनों पर कब्जा कर लेते हैं.
चौकाने वाली बात यह है कि वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा मौत भारत में हुई है. यह संख्या चीन से ज्यादा है.प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण से जहां 1640 लोगों की मौत के मुकाबले चीन में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या (1620 ) ज्यादा है. यह आंकड़े हम यहां इसलिये पेश कर रहे हैं ताकि रायपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिये इसपर नियंत्रण पाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिये. वायूु प्रदूषण के बगैर स्मार्ट सिटी,डिजिटल सिटी बनाने का सपना पूरा हो पाना कठिन है. आज स्थिति यह है कि एक स्थान पर कालेधूल को हटाया जाता है तो शहर का दूसरा भाग कालिख पुतवा लेत…

ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …