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यह चुनाव है या जाति, धर्म, संप्रदाय के नाम पर मारकाट का ऐलान

'''मार डालेंगे, काट डालेंगें , टुकड़े टुकड़े कर देंंगें- हमें सत्ता में आ जाने दो तब हम बतायेंगेÓं- ÓÓऐसे कुछ बयान  हैं जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के महापर्व में उम्मीदवारों व उनके समर्थकों के मुख से निकल रहे हंै.आखिर हम किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं? दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का भविष्य क्या यही है जो हमारे नेताओं के श्रीमुख से सुनाई दे रहा है. सिंहासन पाने के लिये कोई मुस्लिमों को रिझा रहा है तो कोई हिन्दुओं को तो कोई दलितो को रिझाकर आगे बढ़ रहा है. युवाओं को दिग्भ्रमित करने की कोशिशे भी की जा रही है. मुद्दे, जनता तथा देश हित को लेकर बात करने की जगह नेता ये कहां एक दूसरे को लड़ाने वाले मुद्दे लेकर सामने आ गये? दिलचस्प तथ्य तो यह है कि कोई यह नहीं कह रहा कि वह अगर सिहासन पर काबिज होता है तो देश और देश की जनता के लिये क्या करेगा? उसकी विदेश नीति क्या होगी? आतंकवाद, नक्सलवाद जैसे मुद्दों पर बनने वाली सरकार क्या करने वाली है? पडौसी राष्ट्रों, विशेषकर चीन और पाकिस्तान के प्रति उसका रवैया क्या होगा? ऐसे अनेक मद्दों के अलावा यह भी कोई नहीं बता रहा कि देश में भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये उनके पास कौन से जादू की छड़ी है? कोई यह भी बताने को तैयार नहीं कि देश मेें महंगाई को कम करने के लिये क्या देश में चीन की जनसंख्या नीति की तरह कोई नीति अख्तियार की जायेगी? या यूं ही खुली छूट देकर जनसंख्या को इस तरह बढ़ने दिया जायेगा कि देश में कहीं तिल रखने की जगह नहीं होगी और लोगों के समक्ष भूखे मरने की स्थिति निर्मित हो जायेगी.देश में कृषकों की बुरी स्थिति है, गरीबी चरम पर है, कुपोषण से भारी संख्या में मृत्यू हो रही है. जो गरीब है वह गरीब है, मध्यमवर्गीय के सामने अपने परविार को चलाने की समस्या है युवा बेरोजगारों की संख्या में लगातार बढौत्तरी हो रही है. निजी व सरकारी दोनों क्षेत्रों में पहुंच व पार्टी आधारित लोगों को ही नौकरी पर लगाया जा रहा है.इन सब मुद्दों व समस्याओं पर स्पष्ट राय व्यक्त करने की जगह नेता क्या कह रहे हैं, यह भी अपने आप में गौर करने वाली बात है कि वे देश को किस राह पर ले जा रहे हैं. मसलन ''पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनाव अपमान बदले का है जिन्होंने अन्याय किया है डन्हें सबक सिखाने का चुनाव है केन्द्र में मोदी की सरकार बनी तो अगले ही दिन मुल्ला मुलायम की सरकार गिर जायेगी यह बात अमित शाह ने मुजफफरपुर में कही. इससे पहले सहारनपुर में कांग्रेस के प्रत्याशी इमरान मसूद ने कहा कि मोदी की बोटी बोटी कर देंगे अब इसी बात पर राजस्थान की मुख्यमंत्री ने कह दिया कि टुकड़े किसके होंगे चुनाव के बाद पता चलेगा.ÓÓ हालाकि दलों के घोषणापत्र में बेरोजगारी, किसानों की समस्या, विकास जैसे कई मामलों का जिक्र है किन्तु जो वाक युद्व हो रहा है वह वास्तव में मतदातओं को गुमराह कर रहा है.इससे साफ है कि पार्टियां व नेता सिर्फ सत्ता की राजनीति कर रहे हैं उन्हें जनता से कोई लेना देना नहींं. घर्मनिरपेक्षता की दुहाई देने वाली कांग्रेस सरकार, जिसके शासनकाल में भ्रष्टाचार और मंहगाई ने लोगो की कमर तोड़ दी भी अब जाति और धर्म को आधार बनाकर चुनाव में किसी नये मुद्दे को सामने न लाकर अपना अस्तित्व बचाने के लिये मुस्लिम नेताओं की शरण में जा रही है. कांग्रेस और बीजेपी के नेताओं की नीतियों का परिणाम है कि अलग अलग  समुदाय जो कभी एक जुअ हुआ करते थे अब आपस में लड पडे हंै- वास्तविकता यही है कि हमारे नेता देश की सेवा की जगह समाज व वर्ग को बांटने का काम कर रहे हैं यह इस चुनाव में प्रत्याशियों के चयन मामले में भी स्पष्ट हो चुका है प्रत्शशियों की लोकप्रियता सामाजिक स्टेटस, शिक्षा, आपराधिक प्रवृति आदि पर ध्यान दिये बगैर पार्टियों के प्रति समॢपता को देखकर लोकसभा क्षेत्र में जाति और धर्म की बहुलता के आधार पर प्रत्याशी बना दिया गया.यह सब स्पष्ट करता है कि हम किस प्रकार का चुनाव लड़ रहे हैं और किस ढंग की सरकार बनाने की ओर बढ़ रहे हैं. आगे आने वाले पांच वर्षो में शायद एक ऐसी ही लोकसभा में ऐसे ही माननीयों को देश की जनता को झेलना पड़ेगा तो अतिशयोक्ती नहीं होगी.

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ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …