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शहरों में आबादी का बोझ




शहरों में आबादी का बोझ अब चिंता का सबब बनता जा रहा है। सरकार इसपर चिंतित हैं किंतु क्या सिर्फ ङ्क्षचंता करने से इस समस्या का समाधान निकल जायेगा? बढ़ते बोझ से कई प्रकार की समस्याएं जन्म ले रही हैं। शहरों के ट्रैफिक में वूद्वि हो रही है, तो अपराध बढ़ रहे हैं। अलग- अलग गांवों से लोग रोजगार की तलाश में शहरों में पहुंचते हैं। जब रोजगार नहीं मिलता तो अपराध का रास्ता ढूंढ लेते हैं। जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण योजना के पांच वर्ष पूरे होने के बाद शहरीकरण संबंधी योजनाओं-परियोजनाओं को थोड़ी गति मिलने के आधार पर सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन इतने मात्र से संतुष्ट होने का मतलब है, सामने खड़ी चुनौतियों से मुंह मोडऩा। शहरों के आसपास पड़ी कृषि भूमि जहां कांक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रही हैं। वहीं गांव के अपने खेतों को जोतने के लिये आदमी नहीं मिल पा रहे हैं। धीरे- धीरेे हमारे नीति-निर्धारकों को उन विशेषज्ञों के सुझावों पर तत्काल प्रभाव से गंभीरता प्रदर्शित करनी ही होगी। जिन्होंने शहरों की परिवहन व्यवस्था और अन्य समस्याओं का उल्लेख करते हुए एक निराशाजनक तस्वीर पेश की है। यह ठीक नहीं कि शहरों की परिवहन व्यवस्था सुधारने के लिए जो कुछ किया जाना चाहिए उसका आधा भी होता हुआ नजर नहीं आ रहा है। सच तो यह है कि जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण योजना के तहत शहरी ढांचे को सुधारने के लिए उठाए गए कदम एक तरह से ऊंट के मुंह में जीरा जैसे हैं। जब क्रांतिकारी उपायों पर काम करने की आवश्यकता है, तब छिटपुट प्रयास किए जा रहे हैं और वह भी आधे-अधूरे मन से। इन स्थितियों में शहरों की आकर्षक तस्वीर के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। वर्तमान में देश के प्रमुख शहरों में करीब 35 करोड़ आबादी रह रही है। 2030 यानी अगले बीस वर्षो में यह आबादी 60 करोड़ से अधिक हो सकती है। एक आंकलन के अनुसार अगले बीस वर्षो में करीब 70 शहर ऐसे होंगे जहां की आबादी एक करोड़ से अधिक होगी। इन आंकड़ों के आधार पर यह कल्पना सहज ही की जा सकती है कि वर्तमान ढांचे वाले शहर इतनी अधिक आबादी का बोझ सहने में समर्थ नहीं होंगे। इनके लिये कहां से मकान की व्यवस्था होगी? कहां इनके खाने- पीने का इंतजाम होगा और कहां से इनकी अन्य जरूरतों को पूरा किया जायेगा? वर्तमान को देखा जाये तो यहां स्थिति ऐसी है कि जबजब कोई समस्या सिरदर्द बन जाती है। तब उससे निपटने के उपायों पर विचार किया जाता है। अथवा यह सामने आता है कि जब तक इन उपायों पर अमल होता है, तब तक समस्या और अधिक विस्तार ले लेती है। भारतीय शहर आज जिन समस्या का सामना कर रहे हैं वे काफी कुछ एक जैसी हैं, फिर भी उनके समाधान के लिए एकीकृत प्रयास नहीं किये जाते। आवश्यकता केवल इस बात की ही नहीं है कि शहरों का सुनिश्चित विकास हो, बल्कि उनमें ऐसी संस्कृति विकसित करने की भी जरूरत है जिसे हर तबके के लोग आत्मसात हो सके।

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उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

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काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

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रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …