रविवार, 13 अप्रैल 2014

मायावी चक्रब्यूह खूनी पंजों का, जो फंसा वह मरा


शहीदों की बोली कब तक लगेगी?कितने और लोगों को यूं ही जीवन गंवाना होगा-सरकार बताये?


&''एक ब्लास्ट... कई जवान शहीद,
&प्रत्येक के परिवार को तयशुदा बीस लाख का मुआवजा-
&श्रद्वांजलि, निंदा, तोपों की सलामी और उसके बाद सब भूल जाओं...
मुआवजा लेेने के लिये परिजन चक्रब्यूह में फंस जाते हैं, उन्हेें कभी दस्तावेज के लिये प्रताड़ित होना पड़ता है तो कभी किसी अन्य कारण सेÓÓ इसके बाद  फिर वही विस्फोट...नौजवानों का एक नया बेच मायावी नक्सली गुफा में शहीद हो जाता है.आखिर कब तक यह सिलसिला चलता रहेगा?क्या सरकार बस्तर सहित देश के कतिपय राज्यों में इस प्रकार के नक्सली संयत्र खोलकर रखे हुए हैं जो देश के नौजवानों और सरकारी अफसरों को मौत के घाट उतारने के लिये बना रखा है?या नेताओं व सरकार के संरक्षण में इस प्रकार के मायावी संयत्र चल रहे हैं?संदेह इस बात को लेकर भी उठता है कि क्यों नहीं सख्त कदम उठाये जाते?देश के नौजवानों को जानबूझकर मौत के सौदागरों के हाथ सौंपा जा रहा है.एक जवान मरता है तो उसके साथ- साथ उसका पूरा परिवार मरता है. ऐसे गुमराह लोग इस खूनी ताण्डव में लगे हैं जो यह भी नहीं बता पा रहे कि उनका मकसद क्या है और वे क्यों ऐसा कर रहे हैं? इस नक्सली मायावी फैक्ट्री में घुसने वाले कितने ही जवानों को अब तक मौत के घाट उतारा जा चुका है किन्तु सरकार कोई गंभीर कदम उठाने की जगह एक के बाद एक बटालियन को इस गुफा में झोंक रही है. यह भी आश्चर्यजनक  है कि नक्सलियों का निशाना सिर्फ उन बेकसूर जवानों और सरकारी अफसरों पर ही क्यो रहता है जो दूर दराज क्षेत्रों से सरकार के कहने पर अपना व अपने  परिवार का पेट भरने के लिये माओवादी समस्या से निपटने के नाम पर इन जंगली  इलाकों में भेजे गये हैं.झीरमघाटी में नेताओ को एक-एक कर निशाना बनाने के बाद यह पहली बार हुआ है जब मतदान कराने गये सरकारी कर्मचारियों पर हमला किया गया. इसे एक तरह से लोकतंत्र पर हमला भी कह सकते हैं मतदान कराने सरकार द्वारा भेजे गये लोगों के खून से धरती को लाल कर दिया गया.मतदान दल  के करीब सात लोगों को अपनी जान  गवानी पड़ी है इनकी या इनके परिवार  को शायद नक्सलियों ने न कभी देखा होगा न उनसे कभी कोई दश्मनी  रही होगी. अब यह सवाल हैं कि आखिर नक्सली क्या चाहते हैं?अगर आपसी बात कर समस्या को सुलझाने  वाली कोई बात है तो सरकार की तरफ से ऐसी कोई पहल क्यों नहीं की जाती?  इसी  प्रकार यदि समस्या का कोई हल नहीं निकल रहा तो इसको समूल नष्ट करने की कोई योजना ठीक पंजाब की तर्ज पर क्यों नहीं बनाई जाती?कब तक ऐसे निर्दोष लोगों को यूं ही मायावी दढ़बे में मारने के लिये छोड़ा जाता रहेगा?अंग्रेजों के समय में काला पानी हुआ करता था, जहां अपराध करने वालों को भेजा जाता था अब अलग अलग राज्य सरकारों ने अपने अपने इलाकों में ऐसे मायावी दडबे को खुली छूट देकर पनपने दिया है जहां ऐसे लोगों को भेजा जाता है जिनको मौत की सजा देना होता है.ऐसे हालात पैदा होते जा रहे हैं कि सरकार द्वारा न केवल अपने कर्मचारियों की सुरक्षा की बात ढकोसली होती जा रही है बल्कि ऐसा लगने लगा है कि नौजवानों को यूं ही हर पन्द्रह बीस दिन में नक्सलियों के हाथों मरवाने की योजना तैयार कर ली गई है.इस बार चुनाव के दौरान जो कुछ सरकारी कर्मचारियों के साथ हुआ क्या इसके बाद किसी और कर्मचारी का साहस होगा कि वह आगे सरकार के कहने पर इन मायावी गुफाओं में जाकर प्रजातंत्र को अक्षुण्ण बनाये रखने का काम करें?