चुनावी नाराजगी, मानमुनव्वल के बीच एक युग का अंत!

चुनावी नाराजगी, मानमुनव्वल
के बीच एक युग का अंत!
आडवानी मान गये, जसवंत सिंह रूठ गये और छाया का बी फार्म रूक गया... ऐसी खबरों के बीच आज देश के एक महान लेखक खुशवंत सिंह  के निधन ने सभी प्रबुद्व वर्ग को दु:खी कर दिया. सबसे पहले भाजपा के उस महान नेता कि, जिसे लोग जनसंघ काल से जानते हैं तथा भाजपा को आज इस  मुकाम तक पहुंचाने में महान योगदान दिया हैं. इस पड़ाव में आकर इस वरिष्ठ नेता को मानसिक यातना झेलनी पड़ रही है वह अपने आप में एक विचित्र स्थिति है. अपनी मनचाही सीट पाने के लिये उन्हें जद्दोजेहद करनी पड़ी, अंत में वे उस बहुमत के आगे झुक गये जो उन्हें अपने निर्णयानुसार चलने की ताकीत दे रहा था. वास्तव में यह सोचने का विषय है कि आखिर ऐसा क्यों? आडवानी का इस बार कोप उनको भोपाल से टिकिट नहीं देना था, पार्टी उन्हें गांधीनगर या बडौदरा से टिकिट देना चाहती थी लेकिन वे भोपाल पर अड़े थे. अंतत: उन्हें अपने हाईकमान के आगे नतमस्तक होना पड़ा. जब भाजपा में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को संयोजक बनाया जा रहा था तब भी आडवानी का रूख कुछ इसी प्रकार ही था, जो कम से कम अडतालीस घंटे तक चला और फीका पड़ गया. इतने वरिष्ट नेता का दूसरा विरोध और उसके बाद फिर उसी तरह मान जाना दोनों ही उनके पुराने व्यक्तित्व को आघात पहुंचाता है. या तो उन्हें पहले से सीख लेकर ऐसा नहीं करना था या फिर अपने निर्णय पर अटल रहकर अपनी ताक त का अहसास कराना था. दूसरी ओर भाजपा के एक और वरिष्ठ नेता जसवंत सिह भी नाराज है उन्हें भी मनचाही सीट नहीं मिली. एक और वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी भी गुस्से में चुनाव लड़ने के लिये बाध्य हैं और भी कई नेता इस बार बेमन होकर चुनाव में उतरे हैं. असल में अब बुजुर्ग नेताओं का जमाना लद चुका है यह बात इतने वरिष्ठ होते हुए भी यह नेता समझ नहीं पा रहे हैं.. शायद यही कारण है कि उन्हें कई दफे अपनी पार्टी के अंदर ही अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ रहा है.कांग्रेस में भी सबकुछ ठीक नहीं है, देशभर में टिकिट वितरण को लेकर नाराजगी ने कइयों को इधर से उधर कर दिया है. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अब तक कांग्रेस अपने उम्मीदवार का अधिकृ त तौर पर ऐलान नहीं कर पाई है पहले छाया वर्मा फिर सत्यनारायण शर्मा फिर छाया वर्मा और अब फिर सत्यनारायण के साथ प्रतिभा पाण्डे और मोहम्मद अकबर- एक विचित्र स्थिति में गुजर रही है कांग्रेस. इन सब चुनावी माहौल के बीच बुद्विजीवियों के बीच से एक महान लेखक कुशवंत सिंह का उठ जाना भारी क्षति है. जीवन के हर पल को हंसी खुशी जिंदादिली से जीने वाले खुशवंत सिंह ने पत्रकारिता और पत्रकारों के लिये एक नई राह दिखाई. उनके निधन के साथ एक युग का अंत हो गया.

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