एसीबी के जाल में मछलियां सिर्फ तडपती हैं, मरती नहीं





एक लम्बे अंतराल  के बाद छत्तीसगढ़ का एंटी करप्शन ब्यूरो जागा, शुक्रवार  को उसने  एक बड़ी मछली को अपने जाल में फांसा। छत्तीसगढ़ शासन के वन  विभाग मरवाही में डीएफओ पद पर कार्यरत राजेश चंदेला ने संपूर्ण राज्य में अपना  साम्राज्य फैला  रखा है। छापे  में यह स्पष्ट हुआ कि अधिकारी ने अपनी आय से कई गुना ज्यादा की संपत्ति बना डाली है। एंटी करप्शन विभाग की दो दिनी कार्रवाई में ही करीब पांच करोड़  रूपये की संपत्ति का पता चला है, इससे एक बात तो साफ हुई कि छत्तीसगढ़ के भ्रष्टाचारी जंगल में ऐसे कई भ्रष्टखोर मौजूद है जो सरकार में रहकर सरकार को चूना लगा रहे हैं लेकिन एसीबी यह नहीं बता पा रहा है कि इससे पूर्व की गई कार्रवाहियों पर क्या कार्रवाई की गई इनमें जून सन् 2012 में जांजगीर-चांपा अस्पताल के डा. आर चन्द्रा और रामकुमार थवाइत के ठिकानों से नौ करोड़, 5 अक्ूबर 2012 को प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास योजना के कार्यपालन यंत्री जे.एस जब्बी के ठिकानों से 4.5 करोड़, 22 जनवरी को  डिप्टी सेक्रेटरी एम.डी दीवान के ठिकानों से 47 मिलियन की संपत्ति तथा अंबिकापुर कलेक्ट्रेट लैण्ड रिकार्ड  विभाग के बाबू रिषी कुमार के ठिकानों से 6.5 करोड़ के मामले शामिल हैं। एसीबी की कार्रवाई सिर्फ हरासमेंट बनकर रह गई है। कोर्ट तक मामले पहुंचने और उनका निपटारा होने में वर्षो लग जाते हैं। लोकनिर्माण विभाग, परिवहन, स्वास्थ्य, वन कुछ ऐसे विभाग माने जाते हैं जिसे सिर्फ कमाई के लिये जाने जाते हंै। सरकार में बैठे अधिकारी से लेकर मंत्री, नेता सभी यह जानते हैं कि कौन विभाग और कौनसा अधिकारी क्या कर रहा है और कितनी  कमाई कर रहा है फिर पारदर्शिता क्यों नहीं बरती जाती? भ्रष्ट अफसरों को कमाई का लगातार  मौका दिया जाता है। छापे की कार्रवाही अक्सर ऐसे समय पर होती  है जब अफसर रिटायर हाने  के करीब रहता है। एंटी करप्शन की कार्रवाई के बाद कोर्ट में चालान  पेश होने  में वर्षो लग जाते हैं, इस दौरान या तो संबन्धित कर्मचारी रिटायर हो जाता है या फिर उसकी मौत हो गई होती है ऐसे में एंटी करप्शन की कार्रवाही को सिर्फ दिखावा या टारगेट पूरा करना ही माना जाता रहा है। छत्तीसगढ़ में एंटी करप्शन  ब्यूरो द्वारा की गई छापे की बड़ी कार्रवाइयों में से शायद ही कोई ऐसा मामला है जो गिनाया जा सके कि इसमें किसी व्यक्ति को सजा दी गई  हो या उसकी संपत्ति जप्त की गई हो। एक तरह से छत्तीसगढ़ एंटी करप्शन ब्यूरो की कार्रवाही  सिर्फ कर्मचारियों के बीच कुछ समय के लिये दहशत पैदा करने व वाहवाही लूटने का विभाग बनकर रह गया है। छापे के बाद न  तो कर्मचारी सस्पेडं होता है न  ही उनकी सेवाएं खत्म की जाती है। जप्त अनुपातहीन संपत्ति के बारे में भी कोई फैसला नहीं होता। ऐसे भी कई मामले हैं जिसमें भ्रष्ट अफसर को पदोन्नत कर ऊंची कुर्सी पर बिठा दिया जाता है। छत्तीसगढ़ के पडौसी राज्य मध्यप्रदेश में एसीबी ने हाल के वर्षो में अपने जाल  में कई बड़ी मछलियों का शिकार किया है। मुख्यमंत्री का स्पष्ट निर्देश है कि ऐसे लोगों की अनुपातहीन संपत्ति को जप्त कर सरकारी खजाने में डाल  दिया जाय। बिहार में भी ऐसी ही व्यवस्था है फिर छत्तीसगढ़ में भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? 

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