रविवार, 23 मार्च 2014

कौन है पब्लिक सर्वेंट नेता या अफसर?


कौन है पब्लिक सर्वेंट
नेता या अफसर?

 पब्लिक सर्वेंट कौन? एक बड़े नेता के अनुसार हम पब्लिक सर्वेंट हैं? अगर हां तो नौकरशाहों को क्या कहें? नेता किस तरह के पब्लिक सर्वेटं? जो अपनी योग्यता नौकरशाहों से कम रखते हैं?तथा पब्लिक सर्वेंट होने का दंब भरते हैं, नेता जनता का सेवक मानते हैं तो तो उनका चुनाव भी उन सरकारी सेवकों की तरह क्यों नहीं? जो पढ़ लिखकर बड़ी- बड़ी इंटर्व्यू फेस करते हें और उसके बाद ही ऊंची ऊंची कुर्सियों पर बैठने का हक हासिल करते हैं.आईएएस,आईपीएस,आईआरएस, आईएफएस जैसी सेवाओं की नौकरी पाने के लिये दिन रात मेहनत व ऐडी चोटी एक करनी पडती है लेकिन दुर्भाग्य कि बाद में यही नौकरशाह उन मिडिल और हायरसेकेण्डरी पास या फैल लोगों के आगे सलूट ेमारने और हाथ जोड़कर खड़े होने के लिये मजबूर हो जाते हैं.क्या यह इस देश के नौजवानो का अपमान नहीं है? क्या चुनाव आयोग या देश की सर्वोच्च अदालत को इस भेदभाव पर गंभीरता से सोचने की जरूरत नहीं है? क्यों नहीं देश के कर्णधार बन जाने वाले कथित पब्लिक सेवकों के लिये भी एक ऐसी तगड़ी व्यवस्था से गुजरने का रास्ता बना देती जो इस विषम विभिन्नता  को दूर नहीं कर देती? हम समाजवाद, समान अधिकार की बात करते हैं यह अधिकार देश संविधान में भी हर व्यक्ति को प्रदत्त है किन्तु जब पब्लिक सर्वेंट की बात आती है तो पढ़ा लिखा कई प्रतियोगिताओं से गुजरने वाला व्यक्ति अलग हो जाता है और विशेषताओं से कमजोर व्यक्ति ऊंचा हो जाता है.होना तो यह चाहिये कि देश के नेताओं के चयन के लिये भी एक ऐसी व्यवस्था हो जो देश के सारे लोगों को साथ लेकर चलने, देश की कानून और व्यवस्था का ज्ञान रखने वाला हो. इसके लिये यह जरूरी है कि वह कम से कम स्नातक या स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा के साथ अन्य अनेक क्षेत्रों में विशिष्टता रखता हो. ऐसे लोगों की कमी नहीं है हम उनका उपयोग नहीं कर रहे हैं. देश का नौजवान विषम आर्थिक परिस्थितियों में रहकर दिन रात मेहनत कर भी उतनी कमाई कि नौकरी नहीं कर पाता जो नेता और मंत्री बनने वाला कमाता है. -शायद यही कारण है कि अब ज्यादातर सरकारी सेवक आईएएस, आईपीएस तथा सेना के लोग  नौकरी छोड़कर इस व्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं. इसके सिवा उनके ेपास दूसरा चारा भी तो नहीं है या तो वे मिडिल और हायर सेकेण्डी फैल- पास लोगों के समक्ष नतमस्तक हो या फिर उस नदी के बहाव में शािमल हो जाए जो उनकी नैया पार करने के लिये ही बनी है. यह जानकर खुशी हुई  कि इस  बार छत्तीसगढ़ की ग्यारह लोकसभा सीटों पर लड़ने के लिये कम से कम सात पढ़े लिखे  विद्वान सामने आये हंै जबकि दुख इस बात का  है कि शेष सीटों अर्थात कुल  चार सीटों पर लड़ने के लिये किसी भी पार्टी को इस छत्तीसगढ़ की इस चार से पांच करोड़  की आबादी में कुछ और व्यक्ति ऐसे नहीं मिले जो इसी तरह की  योग्यता रखते हो.यह अकेले  छत्तीसगढ़ की बात नहीं है पूरे देश में राजनीतिक दल प्रत्याशियों का चयन कुछ इसी तरह करती है. प्रत्याशी चयन में दल व्यक्ति की पर्सनलिटी तो देखती है लेकिन उसकी योग्यता को नजर अंदाज कर देती है. कोई दल उसकी वाकपटुता को देखता हैं तो कोई उसकी जनता के बीच उसकी पकड़ को देखता है. प्रदेश देश को चलाने के लिये योग्य और कुशल लोगों की जरूरत है वह चाणक्य जैसा विद्वान और वीरबल जैसा बाकपटु तथा बुद्विमान होना चाहिये.क्या कभी हमारे देश की संसद को ऐसे योग्य लोग मिल पायेंगे?  सन् 2009 में जब भारतीय ससंद के साठ वर्ष पूरे हुए तब संसद में स्नातकों की संख्या सिर्फ 79 प्रतिशत थी जबकि इसी अवधि में सिर्फ उनतीस प्रतिशत लोग ही स्नातकोत्तर थे.