गुरुवार, 6 मार्च 2014

बाहुबल-धनबल की तुला पर कानून!



एक गरीब या मध्यमवर्ग का आदमी कानून तोड़ता है तो उसे पुलिस अपने थाने के अंदर बने उन सलाखो के पीछे भेजता है जिसमें से मल -मूत्र की बदबू आती है और एक पहचान वाला या थोड़ा रसूख रखने वाला कानून तोड़ता है तो उसे थानेदार अपनी गोद में बिठाता है और जब कोई बाहुबलि या धनपति कानून का खून करता है तो उसे वातानुकूलित अस्पताल की शैया पर या आलीशान रेस्ट हाउस में सर्वसुविधाओं के साथ रहने की इजाजत देता है आखिर देश में कानून को यूं विभाजित करने का अधिकार किसने दिया ?
क्यों दोहरे- तिहरे मापदंड अपनाये जाते हैं? हमारे संविधान ने तो सभी को समान अधिकार दिया है फिर गरीब-मध्यम वर्ग के लिये एक कानून,बाहुबलि के लिये दूसरा कानून और धनपति के लिये तीसरा कानून क्यों? एक ही कानून को अलग-अलग विभाजित करने का अधिकार कानून के रखवालों को किसने दिया ?  कानून को चंद लोगों ने अपनी जेब में रखकर उसका मखौल बना दिया है.जो कानून आम आदमी की रक्षा के लिये बना है उसे यूं ढीला बना दिया कि उसमें सफेदपोश अपराधी पतली गली से कानून को अपने पैरों तले कुचलता हुआ निकल जाता है. कानून के भीतर कितना सुरक्षित है आम आदमी? जब कोई बाहुबलि, रसूखदार या धनपति आम आदमी को रौंदता है तो कानून क्यों इतना बौना, लचीला और असहाय हो जाता है, क्यों हमें ऐसा लगता है कि हमारी रक्षा करने वाला कोई नहीं? एक समय बाहुबलियों का था, अब धनपति के रूप में एक नया पात्र इस कानून की गोद में आया है जिसे न केवल पुछकारा जा रहा है बल्कि सहलाया भी जा रहा है. कानून का यह पक्षपातपूर्ण रवैया कोई नया नहीं है, इसने अपना एक लम्बा सफर यूं ही किया है.कानून की इस दोहरी व्यवस्था के चलते न केवल गरीब,मध्यम  और असहाय लोग न्याय नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं बल्कि संपूर्ण व्यवस्था पर से भी लोगों का विश्वास उठता जा रहा है.
लोकतंत्र, संप्रुभता, न्यायव्यवस्था और संविधान सब इसी गणतंत्र में मौजूद है किन्तु कानून का यह घिनौना खेल इस बड़ी व्यवस्था की आंखों के सामने हो रहा है.
क्या व्यवस्था को बनाये रखने की जिम्मेदारी लेने वाले यह नहीं देख रहे कि एक आम नागरिक जब कानून तोड़ता है तो उसे कोतवाली के अंदर मलमूत्र की बदबू  वाले हवालात में ठूस दिया जाता है लेकिन जब किसी पैसे वाली की बारी आती है तो उसे तुरंत चक्कर या हार्टअटैक आ जाता है और हमारा कठोर कानून नर्मी दिखाते हुए या तो उसे किसी ऐसे वातानुकूलित अस्पताल के खाट पर पहुंचा देता है या फिर किसी फाइव स्टार गेस्ट हाउस में. आम आदमी को कोतवाली में खाने की बात छोड़ो पानी,चाय नाश्ता भी नसीब नहीं होता जबकि अमीर आदमी के लिये परिवार के लोगों को मिलने के लिये दरवाजे खोल दिये जाते हैं तो घर से खाना और पुलिस की गाड़ी की जगह घर की गाड़ी तक पहुंचा दी जाती है? शायद ऐसा कानून विश्व के किसी देश में नहीं है. भारत मेें अंग्रेजों ने जो इधर-उधर से लेकर कानून बनाया उसे आज भी धिसे पिटे ढंग से चलाया जा रहा है.
अपराधी चाहे वह हत्या करें या चार सौ बीसी करें उसे उन्हीं धाराओं के तहत सजा भी मिलनी चाहिये जो सबके लिये बनी है लेकिन जब हम अपने कानून को देखते है तो इसमें स्पष्ट विभिन्नता सामने आती है हालांकि देश की न्याय व्यवस्था इतनी मजबूत है कि वह इन दोनों किस्म की धाराओं पर किसी प्रकार का कोई भेद नहीं करती लेकिन  अदालतों में जाने से पूर्व ऐसे लोगों की गिरफतारी का जो खेल होता है वह वास्तव में नाटकीय ही नहीं घोर आपत्तिजनक भी है.हाल के समय में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं जिसने संपूर्ण कानून पर उंगली उठाई है. गरीब व मध्यम वर्ग के लोगों के खरे पसीने की कमाई जो करीब बीस हजार करोड़ रूपये होती है को कथित रूप से हड़पने वाले को गिरफत में  लेने के बाद अदालत में पेश कर हवालात में रखने की जगह पुलिस की तगड़ी व्यवस्था के बीच हिरासत में एक ऐसे रेस्ट हाउस में रखा जाता है, जहां किसी फाइव स्टार होटल से भी ज्यादा सुविधाएं हैं। क्या हर आदमी को ऐसी सुविधा हमारी पुलिस देती है? एक दिलचस्प व्यवस्था है हमारी, हम उसे बस देख सकते हैं किसी को कुछ कह नहीं सकते। भारतीय दंड संहिता में ढेर सारी धाराएं हैं. दफा चौतीस से लेकर दफा तीन सौ दो और उससे आगे तक लेकिन यह सब लगता है सिर्फ उन लोगों के लिये है जो किसी न किसी रूप में अपराध में फंस जाते हैं.बड़ी हस्तियां बड़ी धाराओं में फंसती भी हैं तो उनका ट्रीटमेंट भी व्ही आई पी तरीके से होता है अर्थात उनके शरीर के किसी हिस्से में खरोच की तो बात छोड़िये उनके पहने कपड़े पर धूल भी चढ़ने नहीं दी जाती.क्यों हम ऐसे कानूनों को बनाये हुए हैं जो आम लोगों  के लिये कुछ है तो खास लोगों के लिये कुछ. पुलिस के बाद अदालत और अदालत से सजा होने के बाद भी जो ट्रीटमेंट जेल में  ऐसे लोगों को मिलता है वह भी कम विचारणीय नहीं है. ऐसे लोगों के खास इन बंद दीवारी के भीतर भी मौजूद रहते हैं जो इन्हें यहां रहकर भी खास ही बने रहने में मदद करते हैं.