मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

मौत के मुंह में घर का बेटा- परिजनों के आंसू से भीगी छत्तीसगढ़ की माटी

रायपुर दिनांक 1 फरवरी 2011

मौत के मुंह में घर का बेटा- परिजनों
के आंसू से भीगी छत्तीसगढ़ की माटी
जिसके साथ बीतती है वही जानता है दर्द क्या होता है?छत्तीसगढ़ वह दुर्भाग्यशाली राज्य बनता जा रहा है जहां बहुत से लोग प्राय: एक के बाद किसी न किसी अप्रत्याशित गम के दौर से गुजर रहे हैं। कभी किसी का अपहरण,किसी की दुर्घटना में मृत्यु तो कभी कोई बड़ी घटना में परिवार के किसी का गुजर जाना एक आम बात हो गई है। इस समय सर्वाधिक चर्चा है उन पांच जवानों की जिन्हें नक्सली अन्य ग्रामीणों के साथ अपहरण कर जंगल में ले गये। राज्य सरकार से गुहार लगाने के बाद भी कोई हल नहीं निकला तो इन जवानों के परिजन स्वंय उन्हें जंगल में खोजने के लिये निकल पड़े हैं। परिवार के सदस्यों का दर्द इतना ज्यादा है कि उनके मुंह से अब आवाज निकलना तक बंद हो चुकी है। उनके आंसू से धरती गीली होती जा रही है। यह दर्द उन्हें उस समय और बढ़ा देता है जब इन जवानों के साथ अपहरत किये गये ग्रामीण वापस आ जाते हैं मगर जवान वापस नहीं आते। मुख्यमंत्री उा. रमन सिंह ने दिल्ली रवाना होने के पहले नक्सलियों के नाम एक मार्मिक अपील यह कहते हुए की कि वे मानवता के नाते इन निहत्थे जवानों को छोड़ दें। यह जवान छ़ुट्टी पर अपने घर जा रहे थे तभी उनका अपहरण किया गया। कम से कम तेरह दिन हो गये मगर अब तक इन्हें छोड़ा नहीं गया। मुख्यमंत्री की अपील का नक्सलियों पर कोई असर नहीं पड़ा जबकि परिजनों की क्या स्थिति है इसका अंदाज कोइ्र्र भी लगा सकता है। हर पल किसी बुरी या अच्छी खबर की संभावना से परिजनों के सामने अंधेरा ही अंधेरा है। आखिर इस समस्या का हल क्या है? यह पहला अवसर नहीं है जब नक्सली अपहरण की वारदातों के चलते जवानों के परिवारों के समक्ष यह स्थिति निर्मित हुई है। वैसे बहुत कम हुआ है जिसमें नक्सलियों ने अपहरण किये लोगोंं का खून किया हो, पूर्व की घटनाओं के परिपे्रक्ष्य में यह आशा की जा सकती है कि इन अपहरत जवानों को भी सकुशल वापस भेज दिया जायेगा लेकिन चौबीस घंटे बारूद के सामने खड़े इन जिंदगियों के लिये लोग सिर्फ दुआ ही कर सकते हैं। इधर छत्तीसगढ़ में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों द्वारा पैसे की लालच में अपहरण और उनकी हत्या के दौर ने भी लोगों को परेशानी में डाल रखा है। छत्तीसगढ़ में तीन बच्चे अब तक अपहरण के बाद पैसा नहीं मिलने के कारण मारे जा चुके हैं जबकि कई लोगों को बंधक बनाकर उनके परिवारों को दुखभरे क्षणों का अनुभव करने के लिये मजबूर किय गया। परिवार के किसी न किसी सदस्य का खून आम बात होती जा रही है। प्राय: आम आदमी के जीवन में ऐसे क्षण आते हैं, लोग इन खबरों को पड़ते हैं फेक देते हैं किंतु उन परिवारों के बारे में भी जरा सोचिये जिनका कोइ्र्र इकलौता बेटा किसी आंतकवादी के सामाने मौत का इंतजार करता खडा हो। कब मिलेगी इस अंचल के लोगों को इन घटनाओं से मुक्ति?