शनिवार, 29 जनवरी 2011

सत्यनिष्ठों की कमी, बचे-कुचे जो हैं, उल्हें सम्हाले रखना जरूरी!

रायपुर दिनांक 29 जनवरी 2011

सत्यनिष्ठों की कमी, बचे-कुचे जो
हैं, उल्हें सम्हाले रखना जरूरी!
ईमानदार,सत्यनिष्ट, देशभक्त इन नामों के मनुष्य अब दुर्लभ होते जा रहे हैं। जो बचे हैं उन्हें कहीं गोलियों से भून दिया जा रहा है तो कहीं जिंदा जलाया जा रहा है। अगर जल्द ही कोई विशेष कदम नहीं उठाया गया तो इस ढंग के लोगों का नामोनिशान मिट जायेगा। अभी कुछ साल पहले इंडियन आयल कंपनी में गड़बड़ी पकड़ी तो ईमानदार एस. मंजूनाथ को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.... अैार अब महाराष्ट्र में एक एडीशनल कलेक्टर यशवंत सोनवाने को इसलिये जिंदा जला दिया गया चूंकि उसने मिलावट खोरों के खिलाफ सबूत इकट्ठे करने का प्रयास किया। हमारा राष्ट्रीय चरित्र कुछ इस ढंग का बिगड़ा है कि आम जनजीवन से ईमानदार, देशभक्त, सत्यनिष्ठ जैसे अलंकरण अब गायब होते जा रहे हैं। किसी भी प्रकार से एक मुश्त संपत्ति अर्जित करने के लिये लोग अपने देश तक को बेचने के लिये तैयार है। माधुरी गुप्ता सहित वे मीरजाफर इसके उदाहरण है जिन्होंने हाल के वर्षो में अपनी सुविधा और अपने हित के लिये देश को तक बेचने का काम किया। मंजूनाथ की जब हत्या की गई तब ऐसा लगा था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अब सरकार चेतेगी किंतु उस समय चंद लोगों को गिरफतार करने के बाद फिर सरकार ने पीछे नहीं देखा। भ्रष्टाचारियों के हौसले बढ़ते गये। तेल में मिलावट होती है यह देश का बच्चा- बच्चा जानता है। यूपी में संगठित ढंग से मिलावटखोरी के मामले प्रकाश में आने के बाद भी सरकार खामोश रही। वहां यह पता चला था कि यह गिरोह पूरे देशभर में सक्रिय है फिर भी तेल माफियाओं के सामने सरकार खामोश रही। महाराष्ट्र्र्र, गुजरात और अन्य कई प्रदेशों, यहां तक कि छत्तीसगढ़ में भी गरीबो को मिलने वाला मिट्टी तेल किस तरह माफियाओं के चंगुल में पहुंचता है और इसकी मिलावट किस तरह से पेट्रोल डीजल मे होती है यह जानते हुए भी प्रशासन इसलिये खामोश बैठा रहता है चूंकि इसमें बड़े बड़े सफेद पोश लोगों का हाथ है। इनकी गिरेबान पर हाथ डालने का प्रयास कोई नहीं करता। यशवंत सोनवने ने मिलवाटियों की कारगुजारियों का भंडाफोडऩे का प्रयास किया तो उसे गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जिंदा जला दिया गया। सोनवने की शहादत बेकार नहीं गई। सरकार ने मिलावटखोरों के खिलाफ महाराष्ट में जगह जगह छापे मारे कइयों को पकड़ा भी किंतु यह कहानी सिर्फ महाराष्ट्र तक ही क्यों सीमित रह गई? पूरे देश में क्यों नहीं तेल माफियाओं के खिलाफ अभियान चलाया गया? क्या महाराष्ट्र की कार्यवाही को भी हम यह मानकर चले कि यह सिर्फ जनता के त्वरित आक्रोश को दबाने की एक कार्रवाई मात्र है! असल में ऐसी कार्रवाइयों में छोटी मछलियां ही जाल में फंसती है इसके पीछे जो बड़ा खेल चलता है इसकी डोर तो ऐेसे बड़े लोगों के पास रहती है जिसे कोई छू भी नहीं सकता। यह बड़े लोग इन छोटी मछलियों को आसानी से एक ही झटके में छुडा़कर ले जाती हैं। तेल की तरह देश में नकली दवा, नकली खाद्यान्न और अन्य अनेक नकली वस्तुओं का निर्माण कर आम लोगो के जीवन से खिलवाड़ करने वालों का गिरोह सक्रिय है। जब तक ऐसे लोगों को कठोर कानून के दायरे में नहीं लाया जायेगा तब तक हम इन बुराइयो को रोकने की कल्पना भी नहीं कर सकते।