रविवार, 16 जनवरी 2011

मंहगाई का तमाशा.. सरकार कहां?

रायपुर दिनांक 16 जनवरी


मंहगाई का तमाशा.. सरकार कहां?
क्या करें गरीब! मुश्किल में इंसान
जनता गले तक मंहगाई में डूबी हुई है, उसका दम घुट रहा है और भारत के वित्त मंत्री कह रहे ह-ैं 'घबराने की जरूरत नहीं हैंÓ। दूसरी ओर कृषि मंत्री शरद पवार का कहना हैं कि देश में महंगाई बढऩे का उनके विभाग से कोई लेना देना नहीं। इस बीच पेट्रोलियम कंपनियों ने आव देखा न ताव एक माह में दूसरी बार पेट्रोल के भाव में ढाई रूपये की वूद्वि कर दी। पिछली बार भी लगभग इतनी ही वृद्वि की गई थी। पेट्रोलियम मंत्री मुरली दावड़ा हाथ धोकर बैठ गये हैं। आखिर जनता किसके पास जाये? ईमानदारी से काम कर मासिक वेतन पाने वाला इंसान तो समझों मर गया। मंहगाई तो उसे मार ही रही है साथ ही अगर वह बीमार पड गया तो डाक्टर और दवा कंपनियां उसे मार डालेंगी। एक चिकित्सक आज सिर्फ जांचने का दो से लेकर ढाई सौ रूपये तक लेता है तभी वह आसमान छूती जीवनरक्षक दवाएं लिखकर देता है। आखिर क्या करें हम? सरकारों ने हमें किस हालात में लाकर छोड़ दिया है? बाजार में कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो आज एक मध्यम वर्गीय उपभोक्ता कुछ मामूली दाम देकर खरीद सकें। सरकार जहां मंहगाई पर अपना नियंत्रण खो चुकी है वहीं राज्य सरकारें और उनके अधिस्थ संस्थाएं आम आदमी को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। वेट लगाकर राज्य सरकारें पेट्रोल व पेट्रोलियम उत्पादों को और बढऩे में मदद कर रही हैं। स्वायत्त शासी निकाय ने जहां पीने का पानी तक मंहगा कर दिया है वहीं बिजली वालों ने घरों में अंधेरा करने में अब कोई कसर नहीं छोड़ी है। बिजली के दामों में अनाप- शनाप वृूद्वि हाल ही की है। गरीबों का हितैषी बनने वाली सरकार यह नहीं देख रही कि गरीबी मिटाने के नाम पर वह किसका भला कर रही हैं? गरीब अगर अपने 'मोटर सायकिलÓ में चालीस किलो चावल और अन्य कम कीमत में बंटने वाली सामग्री को भरकर ले जाये तो क्या उसे गरीब कहा जायेगा? यही हो रहा है... राज्यो में इसकी माँनिटरिगं की कोई व्यवस्था नहीं है। राजा का चावल,दाल और अन्य सुविधाओं का लाभ वे लोग उठा रहे हैं जो शक्तिशाली हैं। गरीब कहां है किसी को पता नहीं, गरीब कौन है उसकी कोई परिभाषा नहीं, असल गरीब के घर में खाने का अनाज नहीं, पहनने को कपड़े नहीं, वह फुटपाथ पर सोया है। उसकी योजनाओं पर गरीब के नाम पर गुण्डे और मवाली मोज कर रहेे हैं। क्या व्यवस्था है?
सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की मनमानी हद को पार कर रही हैं। विपक्ष इसकी आड़ में राजनीतिक रोटी सेकने में लगा है। सरकार मौन सादे सारा तमाशा देख रही है।