मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

प्याज के आंसू की दरिया बह रही है और सरकार को शर्म नहीं!

रायपुर मंगलवार दिनांक 28 दिसंबर

प्याज के आंसू की दरिया बह रही
है और सरकार को शर्म नहीं!

टमाटर लाल,
प्याज ने निकाले आंसू,
गैस में लगी है आग-
ऐसे शीर्षकों से अखबार भरें पड़े हैं फिर भी हमारी सरकार को शर्म नहीं आ रही। कृषि मंत्री शरद पवार बेशर्मी से कहते हैं-प्याज के लिये अभी और रोना पड़ेगा- वे यह नहीं कहते कि स्थिति शीघ्र नियंत्रण में आ जायेगी। हर बार कृषि मंत्री एक भविष्य वक्ता की तरह कभी गन्ने के भाव बढऩे की तो कभी शक्कर के भाव तो कभी दालों के भाव बढने की बात कहकर कालाबाजारियों व जमाखोरों को मौका देते हैं। प्याज के मामले में गैर जिम्मेदाराना बयान के बाद प्रधानमंत्री को स्वंय संज्ञान लेना पड़ा तब कहीं जाकर विदेशों विशेषकर पाकिस्तान से प्याज पहुंचा और बाजार की स्थिति में थोड़ा बहुत सुधार आया किंतु यह सारी स्थिति एक तरह से उस समय पैदा होती है जब सत्ता में बैठे लोग गैर जिम्मेदाराना बयान देते हैं। यह भी समझ के बाहर है कि जिसे व्यवस्था करनी है वह व्यवस्था करने की जगह कमी और परेशानी का राग अलापकर सात्वना देता है या अपनी विवशता पर मरहम पट्टी लगाने का काम करता है। आज सामान्य व्यक्ति के लिये भारी मुश्किलें खड़ी हो गई है। पेट्रोल के भावों में लगातार बढौत्तरी से लोगो की तनखाह का एक बड़ा हिस्सा पेट्रोल में ही निकल जाता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे माल के भाव में तेजी आये या नहीं हमारे देश में पेट्रोल,डीजल के भाव में तेजी लाने की शुरूआत हो जाती है। उपभोक्ता को आज की स्थिति में किसी क्षेत्र में राहत नहीं है। ईमानदारी से दो जून की रोटी जुटा पाने वाले इंसान को यूं सरकार कब तक आश्वासन के घूंट पिलाती रहेगी, रोज कमाने खाने वाले को एक माह में मिलने वाला वेतन हर दृष्टि से कम पड़ रहा है- इससे वह क्या करें? अपने मां बाप, पत्नी बच्चों का इलाज करायें? स्कूल में बच्चो को भारी फीस देकर पढऩे भेजे, मकान का किराया अदा करें। बच्चों के कपड़े लत्ते व अन्य आवश्यक जरूरतों को पूरा करें और साथ साथ घर के रसोई की आवश्यकता की पूर्ति करें? वेतन इतना कम पड़ जाता है कि आगे उसके लिये महीना निकालना कठिन हो जाता है। आगे आने वाले दिनों में गैस के भाव सौ रूपये तक बढ़ाने की पूरी तैयारी कर ली गई है अर्थात गैस पांच सौ रूपये तक मिल जाये तो आप भाग्यशाली हैं जबकि ट्रेन व बस की यात्रा भी लोगों के लिये मंहगी साबित हो रही है। स्वास्थ्य सेवाओं का तो यह हाल है कि इसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं हैं। छोटी मोटी बीमारी का इलाज चिकित्सक और दवा मिलाकर पांच सौ से हजार रूपये से नीचे नहीं जाता जबकि एक बार चिकित्सक के पास जाने वाले को अनेक किस्म के टेस्टों से गुजरना पड़ता है। इसका खर्च अलग। आगे आने वाले दिनों में रसोई इतनी मंहगी हो सकती है कि ग्रहणियां क्या करें क्या न करें की स्थिति में आ सकती है। गैस के दाम बढऩे के संकेत के साथ बिजली की कीमतों में भी वृद्वि की संभावना व्यक्त कर दी गई है। जिनके पास अपना घर है वह भी परेशान है-एक छोटी सी रिेपेयरिंग के लिये उसे आज लेबर नहीं मिलते वहीं निर्माण सामग्रियों में आई बढौत्तरी किसी को काम जारी रखने की हिम्मत ही नहीं देती।