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शर्म करो ..अब किया तो किया भविष्य में किया तो कोई तुम्हें माफ नहीं करेगा!

शर्म करो ..अब किया तो किया भविष्य
में किया तो कोई तुम्हें माफ नहीं करेगा!


यह केक था या देश का दिल जिसे गुरुवार को कांग्रेसियों ने चाकू से काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिये? हम बात कर रहे हैं देश की सबसे शक्तिशाली महिला सोनिया गांधी के जन्म दिन पर कांग्रेसियों द्वारा काटे गये केक की। वाराणसी में आंतकी हमले के परिपे्रक्ष्य में सोनिया गांधी ने इस वर्ष अपना जन्म दिन नहीं मनाने का ऐलान किया था लेकिन उनके अति उत्साही कार्यकर्ताओंं ने केक काटा, इसपर किसी को कोई आपत्ति नहीं है लेकिन केक को राष्ट्रध्वज का प्रतीक बनाकर जिस ढंग से गोदा गया यह कितना उचित था? यह कांग्रेसियों का सोनिया के प्रति पे्रम का प्रदर्शन था या राष्ट्र के प्रतीक का अपमान? जब राष्ट्रीय अध्यक्ष ने स्वयं अपना जन्म दिन नहीं मनाने का ऐलान किया था तब इन कांग्रेसियों को कौनसा भूत सवार हो गया कि वे सारी मर्यादाओं को त्याग कर एक ऐसा केक उठा लाये जो बिल्कुल तिरंगे के आकार का था जिस पर चक्र भी बनाया गया था। अगर केक काटना ही था तो एक सामान्य केक काटकर अपनी खुशी का इजहार कर सकते थे, लेकि न सबसे अलग दिखाने की चाह व होड़ में वे यह भी भूल गये कि यह एक संवैधानिक अपराध है। जिसकी सजा तीन साल की जेल या जुर्माना दोनों हो सकता है। राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय प्रतीक और राष्ट्रीय नेताओं के अपमान का एक सिलसिला सा चल पड़ा है। राष्ट्रीय ध्वज को पाकिस्तान ने कुछ दिन पूर्व उलटा फहराया था। ऐसा ही कुछ इससे पूर्व यूरोपीय देश में हुआ। राष्ट्रीय नेताओं के अपमान की तो एक लम्बी गाथा है- कभी अमरीका में भारत के पूर्व राष्ट्रपति से दुव्र्यवहार होता है तो कभी भारतीय राजनयिकों को कपड़े उतारकर अपनी सुरक्षा जांच कराने का हुक्म दिया जाता है। देश के अंदंर ही राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान करने वालों का तांता लग गया है जिस पर किसी की नजर ही नहीं है। आस्टे्रलिया में तो रोज कोई न कोई भारतीय अपमानित होता है। इन अपमानों की एक लम्बी फेहरिस्त के बाद भी हमें शर्म नहीं आती कि हम ऐसे राष्ट्रों के अतिथि बनकर दुबारा पहुंचते हैं और दुबारा अपमानित होते हैं। अफ्रीका में महात्मा गांधी को ट्रेन से उठाकर फेंका तो उसकी चिंगारी पूरे विश्व में आग बनकर झुलसने लगी और देश आजाद हो गया किंतु आज उसी गांधी के देश में उसके अपने ही लोग राष्ट्रध्वज का अपमान कर रहे हैं। घूसखोरी, शराब खोरी, चोरी, लूट, बलात्कार, डकैती और हत्या से राष्ट्र के मुंह पर कालिख पोत रहे हैं। क्यों हम इस अवसाद की स्थिति में पहुंच गये? कौन जवाबदार है इसके लिये? क्या राष्ट्रीय ध्वज को केक बनाकर काटने वाले कांग्र्रेसियों में इतनी भी समझ नहीं रह गई कि वे जिसे चाकू से काट-काट कर खुशियां मना रहे हैं। वह करोडों राष्ट्रभक्तों के संघर्षों की एक संपूर्ण दास्तां का प्रतीक है। जव वह हवा में लहराता है तो देश का सीना तन जाता है, देश की आंखें चमक उठती हंै और हम गर्व से कहते हैं-'सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ता हमारा-Ó
शर्म करो -अब किया तो किया, भविष्य में ऐसा करोगे तो शायद कोई तुम्हें माफ नहीं करेगा।

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