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मंशा नहीं ,फिर भी अपराध,ऐसी भी है कानून में कुछ खामियां!

रायपुर दिनांक 11 नवंबर 2010
मंशा नहीं ,फिर भी अपराध,ऐसी
भी है कानून में कुछ खामियां!
कानून भावना मेंं नहीं बहता, साक्ष्य मिला तो सजा,वरना बरी। ऐसे कितने ही मामले रोज अदालतों में पहुंचते हैं जिसमें अपराध करने वालों की मंशा अपराध करने की नहीं होती, किं तु हो जाता है। ऐसे में भारतीय दंड विधान की कई धाराएं एकसाथ सक्रिय हो जाती हैं, जो ऐसे व्यक्ति के निकलने के सारे रास्ते बंद कर देती हैं। क्या कानून में भावना या इमोशन को स्थान दिया जाना चाहिये? इस सबंन्ध में कानूनविदो व आम लोगों की अलग- अलग राय हो सकती है। लेकिन कुछ अपराध ऐसे होते हैं जो मर्जी से नहीं किये जाते, बस हो जाते हैं। ऐसे अपराधों को क्यों न इमोशन के आधार पर छोटी-छोटी सजा में बदला जायें? अब जयपुर के उस पॉलीटेक्रिक कालेज के डिप्लोमाधारी युवक दीपक की ही बात करें, जिसने लव मैरीज के बाद अदालती कार्रवाही के खर्चे पांच लाख रूपये निकालने के लिये बैंक में एटीएम और लॉकर तोडऩे की योजना बनाई। जिसके लिये वह बैंक के अंदर पूरे साजोसामान के साथ करीब चार दिन रहा और अंत में नाकामी के साथ पकड़ा गया। कानून की नजर में वह चोर है, और सामााजिक दृष्टि से देखे तो थोड़ा बहुत इमोशन इस युवक के प्रति भी मुड़ता है कि उसके सामने यह समाज विरोधी कृत्य जिसे कानून की नजर में अपराध कहते हैं, करने के सिवा कोई दूसरा उपाय ही नहीं था। पांच लाख रूपये आम आदमी के लिये एक बहुत बड़ी रकम होती है जिसे वह न समाज से मांग सकता है और न अपनों से। दोनों ही उसे अपने रास्ते पर छोड़ देंगे। लेकिन जब उसने बैंक में घुसने का अपराध किया तो वह सबकी नजर में चोर बन गया। यह कृत्य उसने तब किया जब वह हर तरफ से हार गया। इसके सिवा कोई दूसरा उपाय उसके पास था भी नहीं। समाज और कानून को बनाने वालों को ऐसे सवालों का जवाब ढूंढने की जरूरत है। यह युवक सदा के लिये चोर बन गया। भले ही उसे इस कृत्य के लिये एक पैसा भी न मिला हो। दूसरा उदाहरण हम रायपुर में हाल ही घटित उस विस्फोट का दे सकते हैं, जिसने संपूर्ण छत्तीसगढ़ को हिलाकर रख दिया। पहले यह समझा गया कि यह कृत्य रायपुर में पिछले कई समय से सक्रिय कथित डॉन गिरोह का है या फिर नक्सलियों ने दहशत फैलाने के लिये किया है। लेकिन जब पुलिस को तहकीकात के अंतिम समय में जो सुराग मिला उसे कह सकते हैं- खोदा पहाड़ निकली चुहिया- लालच बुरी बलाये, उन युवकों के साथ भी वही हुआ, जो अमूमन अनजाने में अपराध कर जाते हैं। कचरा फेंकने निकले थे और विस्फोट में फंस गये। दवा दुकान अथवा गोदाम में सड़ रहे माल को कबाडी के हाथ बेचने निकले लड़कों को लगा कि अगर कबाड में जा रहे माल में से तांबा निकाल लिया जाये। तो शायद इससे उनकी दीवाली खुशहाल हो जायेगी। इसी चक्कर में उन्होंने मेडिकल कॉम्पलेक्स के कचरे के ढेर में अपने कबाड में रखे डेटोनेटर को मिलाकर आग लगा दी और इससे जो विस्फोट हुआ उसने पूरे प्रशासन को हिला दिया। अपनी निर्दोषिता साबित करने के लिये यह लड़के तत्काल पुलिस में पहुंचकर अपनी गलती स्वीकार कर लेते, तो भी शायद उन्हें सजा होती। क्योंकि उन्होंने ऐसा कृत्य किया था, जिसने संपूर्ण व्यवस्था को झकाझोर दिया। इस मामले में यद्यपि अदालत मेंं यह लड़के अपनी निर्दोषिता सिद्व कर दे। लेकिन उनके जीवन में आये इस कानूनी दांव- पेंच ने न केवल दवा उठाकर देने वालों के सामाजिक जीवन को मुसीबत में डाल दिया। वरन् कई परिवार जो इन पर आश्रित हैं, उनको भी मुसीबत में डाल दिया। समाज व कानून को ऐसे मामलों में गंभीरता से सोच- विचार कर कोई ऐसा रास्ता निकालना चाहिये कि गेहूं के साथ घुन न पिस सके।

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