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आंतकवाद, जातिवाद की बराबरी में आ खडा हुआ भ्रष्टाचार!

रायपुर शुक्रवार 19 नवंबर
आंतकवाद, जातिवाद की बराबरी
में आ खडा हुआ भ्रष्टाचार!
वह कौन सी जादुई छड़ी है जिससे घूसखोरी का इलाज किया जायें? राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत मानते हैं कि जब तक चुनावी चंदे पर रोक लगाकर पब्लिक फण्ड से चुनाव लडऩे की व्यवस्था लागू नहीं होगी, तब तक भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लग सकती। बकौल गहलोत देश में कैग, सीवीसी, सूचना का अधिकार जैसी कई संस्थाएं और कानून बन गए, लेकिन भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है, क्योंकि चुनाव के लिए चंदा लेते ही भ्रष्टाचार की शुरूआत हो जाती है। क्या यही एक कारण है? बहुत हद तक इसे ठीक माना जा सकता है चूंकि इस फंड की बजह से ही देश में मंहगाई बढ़ती है और भ्रष्टाचार फैलता है। गहलोत तो यहां तक कहते हैं कि कितनी भी संस्थाएं बना ली जाएं, भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लग सकता। जब देश के एक मुख्यमंत्री की यह धारणा है तो भ्रष्टाचार में लिप्त इस देश को भगवान ही बचा सकता है। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की नाकामी में गहलोत का यह कहना कि ठेकेदार अफसर के साथ मिलीभगत कर रहे हैं। पैसे को इस ढंग से खर्च करना कि जनता को इसका पूरा लाभ मिले यह बहुत मुश्किल है और अब नरेगा जैसी योजनाओं में मिलने वाली भारी धनराशि के कारण यह काम सरकार के लिए और भी मुश्किल हो गया है। इससे यह साफ जहिर है कि सरकार के पास ऐसा कोई उपाय बचा ही नहीं है जिसके मार्फत देश में व्याप्त भ्रष्टाचार से आम जनता को निजात दिलाई जायें। चुनावी फंड पर जनता तो लगाम नहीं लगा सकती। इसे सरकार को ही कानून बनाकर खत्म करना होगा। जब सारी बाते जनप्रतिनिधि जानते हैैं तो इसे वे जनता के पाले में क्यों फेंकते हैं। सरकार को कठोर से कठोर कानून बनाने से किसने रोका? भ्रष्टाचार सिस्टम में घुसकर आतंकवाद और जातिवाद जैसी ही चुनौती बन गया है, जो देश को खोखला कर रहा है। जो लोग देश के प्रमुख उद्योगपति टाटा को तक नहीं छोड़ते उनके अधिनस्थ काम करने वाले कर्र्मचाारी अधिकारी साधारण लोगों को कितना नौचते होंगें इसकी कल्पना की जा सकती है। टाटा के बयान के बाद दूसरे प्रमुख उद्योगपति राहुल बजाज ने भी यह स्वीकार किया है कि देश की कई बड़ी कंपनियां रिश्वत देकर अपना काम निकलवाती हैं। बकौल बजाज, आजकल देश में रिश्वत देना आम बात हो गई है। बजाज राज्य सभा के सदस्य भी हैं वे इसके लिये उन लोगों को दोषी करार देते हैं जो काम करवाने के लिये रिश्वत देते हैं मगर बजाज साहब बात यहीं खत्म नहीं होती चूंकि अगर पैसा नहीं दो तो हर आदमी का हश्र ऐसा ही होगा जैसा टाटा का हुआ- टाटा मांगे पन्द्र्रह करोड़ रूपये दे देते तो आज वे एक एयरलाइंस के भी मालिक होते। देश में ऐसे आदर्शवादियों की कमी नहीं हैं, रिश्वत नहीं देने के कारण उनकी कई योजनाएं अटकी पड़ी हैं-ऐसे लोगों का काम होगा भी नहीं जब तक वे संबन्धित व्यक्ति की मांग पूरी न कर दें।बजाज ने कहा है कि कंपनियां बिना रिश्वत दिए भी अपना काम करवा सकती हैं। बल्कि उनके लिए तो यह एक आम आदमी की तुलना में ज्यादा आसान होगा। बस उनमें इतना माद्दा होना चाहिए कि वो रिश्वत देने से मना कर सकें। हमारे अनुसार यह कहना आसान लगता है लेकिन बात जब हकीकत में आती है तो आप कुछ नहीं कर सकते मान लीजिये आप किसी छोटे मोटे झगड़े में फंस गये और पुलिस वाला कानून बताकर आपसे कह रहा है कि पांच हजार दो तो आदमी छूट जायेगा वरना उसे लाकअप में रहना पड़ेगा और कल उसे अदालत में पेश किया जायेगा , हो सकता है उसे जेल भी भेज दिया जाये- इस स्थिति में परिजन क्या करेगा? स्वाभाविक है कि वह अपने व्यक्ति को पैसा देकर छुडाना ही बेहतर समझेगा। रिश्वत ने हर व्यक्ति को जाल में जकड़ लिया है जिसका अंंत सिर्फ कठोर कानून है उसके बगैर देश में हम केवल भ्रष्टाचार को कोसने के सिवा कुछ नहीं कर सकते।

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