शनिवार, 13 नवंबर 2010

खाकी के वेश में यह दूसरे गृह के प्राणी धरती पर क्या कर रहे हैं?

\
रायपुर शनिवार।
दिनांक १३ नवंबर २०१०
खाकी के वेश में यह दूसरे गृह के
प्राणी धरती पर क्या कर रहे हैं?
खाकी पहना पुलिस वाला कोई अपराध करें, तो उसके लिये अलग कानून और आम आदमी ने ऐसा कर दिया, तो उसके लिये अलग कानून। क्या दोनों के अपराध करने का तरीका अलग- अलग होता है? बलात्कार जैसे मामले मेंं अपराधी को तुरन्त गिरफ्तार कर हथकडिय़ों में जकडऩे का प्रावधान है। फिर पुलिस ऐसे अपराध पर इस ढंग की कार्रवाई क्यों नहीं करती?- हम बात कर रहे हैं धर्मजयगढ़ थाने की जहां कि पुलिस पर आरोप है कि उसने दो युवतियों की अस्मत को रौंद डाला। पहले इस मामले पर खूब बवाल मचा। बाद में युवतियों ने बलात्कार से इंकार किया और डाक्टरी परीक्षण से भी इंकार कर दिया। पुलिस के आला अफसर रिपोर्ट लिखने की बात छोडिय़े। इस मामले के अपराधी पुलिस वालों को पकड़कर सींखचों के पीछे भेजने तक से कतराते रहे । समाज की सुरक्षा का दायित्व जिन कंधों पर है, वह जिस ढंग का खेल खेल रहा है। वह उसकी संपूर्ण कार्यप्रणाली को ही एक बार पुनरीक्षित करने का दबाव बना रहा है। धर्मजयगढ़ में कथित बलात्कार की घटना के बाद गा्रमीणों के आक्रोश से कुछ तो कार्रवाई हुई। वरना युवतियों को अपराध के बाद जिस ढंग से दबाया गया, उससे तो लगता है कि इस थाने में यह आदत सी बन गई है। बहुत कम ही मामले होते हैं जिसमें कोई महिला अपने ऊपर बलात्कार का आरोप लगाकर अपने जीवन को दांव पर लगाती हैं। क्या इस मामले में युवतियों व उसके परिवार पर पुलिस का व्यापक दबाव नहीं पड़ा? महिलााओं पर अत्याचार के मामले में सरकार के कड़े कानून की भी पोल इस मामले से खुल जाती है। चूंकि संपूर्ण सूचना देेने के बाद भी महिला अत्याचार को गंभीरता से नहीं लिया गया। बाद में अब यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि बलात्कार हुआ ही नहीं। अगर ऐसा है तो युवतियों पर उलटा मुकदमा क्यों नहीं कायम किया गया? पुलिस युवतियों के पलटने के बाद उनको डाक्टरी परीक्षण के लिये मजबूर भी तो कर सकती थी ताकि- दूध का दूध और पानी का पानी अलग हो जाये। बलात्कार की इस घटना ने जिसने पूरे छत्तीसगढ़ की पुलिस को दागदार किया है। पुलिस को इसे धोने के लिये संपूर्ण मामले की निष्पक्ष अधिकारियों से जांच कराई जानी चाहिये। यह अकेले धरमजयगढ़ का मामला नहीं हैं, जहां खाकी पर दाग लगा है। लवन में शनिवार को एक युवक को चोरी के शक में पकड़कर मरा समझकर उसके घर लाकर फेंक दिया गया। इसके विरोध में ग्रामीण सड़क पर आये, तो प्रशासन जागा। राजधानी रायपुर के कुछ थाने तो ऐसे हैं, जहां फरियादी की एफआईआर दर्ज करने तक के पैसे मांगे जाते हैं। नियम यह कहता है कि थाने में एफआईआर दर्ज करने के बाद एफआईआर की कापी फरियादी को भी दें। किंतु क्या पुलिस के आला अफसर बता सकते हैं कि कितने थानों में एफआईआर दर्ज होने के बाद फरियादी को उसकी कापी दी जाती है? खाकी की हरकतें खुद उसे गर्त की ओर ले जा रही हैं। कभी शराब पीकर रास्ते पर हुडदंग तो कभी किसी निर्दोष को पीट- पीटकर अधमरा कर दिया जाता है। तो कभी थाने में ही किसी युवती की अस्मत लूट ली जाती है। हम कौन से युग में जी रहे हैं? असल बात तो यह है कि खाकी वर्दी पहनने के बाद पुलिस अपने आपको समाज से अलग- थलग एक दूसरे ग्रह का प्राणी समझने लगता है। उसे हमारी पृथ्वी पर रहने वाले जीव दूसरी तरह के नजर आते हैं। आपने कभी किसी समारोह में पुलिस जवानों को ट्रकों में भरकर ड्यूटी पर जाते देखा है- उस मार्ग से जाती महिला को इतना शर्मिन्दा कर दिया जाता है कि वह रास्ते पर आगे बढऩे की हिम्मत नहीं करती। यह है हमारी फोर्स का अनुशासन। जिसे समाज सुधारने का दायित्व सौंपा गया है। असल में पुलिस को हाईटेक करने से पहले उसे पूरी तरह से अनुशासन में रहने और समाज के बीच कैसे काम करना है, यह सिखाया जाना चाहिये। पुलिस के ऐसे जवानों को जो अपने परिवार से दूर रहते हैं। उन्हें क्यों ऐसे ग्रामीण थानों में तैनात किया जाता है, जहां वे अपनी पूरी मनमानी करते हैं?