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बीते रे दिन!

रायपुर ,गुरुवार, दिनांक ५ नवंबर
बीते रे दिन!
खुशी,उमंग और उल्लास से भरा दीपोत्सव का त्यौहार हर भारतवासी के जीवन में और खुशियां बिखेरे यही आशा हम दीपोत्सव पर कर सकते हैं। भगवान राम के चौदह साल वनवास के बाद अयोध्या वापसी पर हर साल हम दीप जलाकर आतिशबाजी कर उनके स्वागत व देश की खुशहाली और उन्नति के लिये यह त्यौहार मनाते हैं। आज से एक नया साल शुरू होता है लेकिन पिछला हमारा कोई ज्यादा अच्छा भी नहीं रहा। भगवान राम की जन्म भूमि का विवाद देश की एक छोटी कोर्ट से जरूर निपटा लेकिन आगे यह अब भी विवादास्पद बना हुआ है या बना दिया गया है। मगर एक आशा जगी है कि हर समुदाय और संप्रदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचे बगैर इस मामले को देश की सर्वोच्च अदालत इसे भी सदा- सदा के लिये निपटा देगी। सन् 1947 में आजाद हुआ हमारा देश अब बुजर्गियत के कगार पर पहुंच गया है। त्रैसठ वर्षो का लम्बा सफर तय कर लिया गया है। गरीबी,अज्ञानता,मंहगाई, भ्रष्टाचार, आंतक जैसी बुराइयों से हम आज भी निजात नहीं पा सके हैं। देश में नासूर बन चुके नक्सलवाद पर न केन्द्र की कोई नीति हैं और न राज्यों की। समस्या जैसे की तैसे से और बदतर होती जा रही है। बीते कुछ साल का जिक्र करें, तो हम देखते हैं कि हमने कुछ नहीं पाया। गरीब और गरीब हो गये, अमीरों की संख्या बढ़ गई, आंतकवाद पर पिछले वर्षाे के मुकाबले बहुत हद तक हमने सबक लेकर काबू पाया ,किंतु आम आदमी की जिंदगी में कोई सुधार नहीं आया। बेरोजगारी बढ़ गई-इससे उत्पन्न होने वाली समस्याओं ने संपूर्ण देश को घेर लिया। भ्रष्टाचार की जडं़े और मजबूत हो गई। विश्व के भ्रष्टाचार क्रम में भारत का दर्जा बढ़ गया। भ्रष्ट अफसरों, नेताओं तथा अन्य प्रभावशाली लोगों की तिजोरियां इतनी भारी हो गई कि उठाते नहीं बनता। देश के विकास और निर्माण के नाम पर निकलने वाला पैसा कई रावणों की तिजौरियों में भर रही हैं। पड़ोसी राष्ट्रों से संबन्ध सुधरने का दूर-दूर तक पता नहीं। चीनी ड्रेगन कब हम पर वार कर दे कोई नहीं जानता। पाकिस्तान आंतकवादियों की फौज तैयार करने में लगा है। उसकी निगाह हमेशा हमारी जमीन पर आंतक फैलाने और अस्थिरता लाने की रहती है। भारत विश्व में तीसरी ताकत बनकर उभरकर आया है लेकिन विदेशों से अच्छे संबन्ध बनाने के मामले में हम अब भी पिछड़े हुए हैं। दीपावली के इस दौर में हमारे बीच विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की उपस्थिति आत्मीयता का आभास जरूर करायेगी, लेकिन उनका रूख भी भारत के प्रति उतना खास नहीं है जैसा हम चाहते हैं। हमें विश्व के सबसे बड़े फोरम सुरक्षा परिषद में जगह जरूर मिल गई लेकिन स्थाई सदस्यता के मामले में अमरीकी रूख अभी भी साफ नहीं है। प्रकृति इस बार देश के प्रति बहुत हद तक मेहरबान है। हालांकि भारी वर्षा और बाढ़ से काफी तबाही हुई है किंतु अन्य वर्षो के मुकाबले फसल अच्छी होने से कुछ तो राहत की उम्मीद की जा सकती है। आर्थिक मोर्चे पर हमारी हार चिंता का विषय है। महंगाई पर काबू पाने में नाकामी हर आदमी को चिंतित किये हुए है। पेट्रोल-डीजल को सरकार ने स्वतंत्र कर दिया। फलत: इसके दामों पर कोई नियंत्रण नहीं रहा। हम दीप जलाकर आतिशबाजी कर खुशियां जरूर मना रहे हैं। साथ में आगे की कई चिंता हमारे दिल को कचोट रही है। फिर भी हम यही सोचते हैं कि भगवान राम ने जिस तरह रावण का वध कर एक नये युग का सूत्रपात किया था, वह युग आगे के वर्षो में हमारे जीवन में आयेगा। आप सभी को दीपमामलाओं के इस मंगलमय उत्सव की अशेष शुभकामनाएं.....।

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उम्र कैद की सजा पर से संदेह खत्म! क्या फांसी की सजा पर भी सुको सज्ञान लेगी?

याकूब मेनन को फांसी  से पहले व बाद से यह बहस का विषय है कि फांसी दी जानी चाहिये या नहीं अभी भी इसपर बहस जारी है लेकिन इस बीच उम्र कैद का मामला भी सुर्खियों में है कि आखिर उम्र कैद होती है, तो कितने साल की? यह माना जाता रहा है कि उम्र कैद का मतलब है- चौदह साल जेल लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि उम्र कैद चौदह साल नहीं बल्कि ताउम्र है याने अपराधी की जब तक जिंदगी है तब तक उसे जेल में ही काटनी होगी. छत्तीसगढ के धीरज कुमार, शैलेन्द्र और तीन दोषियों के मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर और वी गोपाला गोवड़ा की बेंच ने समाज के एक वर्ग द्वारा फांसी की सजा के विरूद्व अभियान पर टिप्पणी करते हुए कहा की यह वर्ग चाहता है कि फांसी को खत्म कर उसकी जगह आजीवन कारावास की सजा दी जाये तथा स्पष्ट किया कि उम्र कैद का मतलब उम्र कैद होता है न कि चौदह साल. अपराधी जिसे उम्र कैद हुई है उसे अपनी पूरी उम्र सलाखों के पीछे बितानी होगी. इससे यह तो संकेत मिलता है कि भविष्य में फांसी को खत्म करने पर भी विचार किया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने अब तक उम्र कैद के संबन्ध में चली…

काले धूल के राक्षसों का उत्पात...क्यों खामोश है प्रशासन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के औद्योगिक क्षेत्रों-उरला, सिलतरा, सोनढोंगरी,भनपुरी से निकलने वाली काली रासायनिक धूल ने पूरे शहर को अपनी जकड़  में ले लिया है .यह धूल आस्ट्रेलिया के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाली धूल से 18 हजार गुना ज्यादा है.
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ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी …