सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

उम्र कैदी का मार्मिक पत्र..

रायपुर दिनांक १८ अक्टूबर २०१०

उम्र कैदी का मार्मिक पत्र..क्या कभी
हमारी व्यवस्था की आंख खुलेगी?
अभी कुछ ही दिन पहले मुझे एक पत्र मिला, यह यूं ही टेबिल पर पड़ा था। कल फुर्सत के क्षणों में जब मंैने इसे खोलकर देखा तो यह जेल में बंद एक उम्र कैदी का था जिसने चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दलों की उस बैठक पर मेरे आलेख पर उसने अपनी टिप्पणी दी थी। आलेख में मंैने लिखा था कि- वे ही लोग अब राजनीति में बढते अपराधीकरण पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं, जिन्होंने किसी समय इसे बढ़ावा दिया। उमर कैद की सजा भुगत रहे कैदी ने पत्र में जेलों में बंद ऐसे कैदियों का जिक्र किया है, जो अपने को निर्दोष साबित नहीं कर सके और झूठे साक्ष्यों के आधार पर सजा भुगत रहे हैं। 'वो कहते हैं न- गेंहू के साथ घुन भी पिस जाता है।Ó ऐसा ही हमारे देश मेें हो रहा है, जहां की जेलों में ऐसे कई निर्दोष व्यक्ति सड़ रहे हैं जिन्होंने कभी कोई अपराध किया ही नहीं, किंतु किसी के बिछाये हुए जाल का शिकार हो गये। ऐसे लोग या तो किसी राजनेता, पहुंच अथवा प्रभावशाली व्यक्तियों की टेढ़ी दृष्टि के शिकार बन गये। ऐसे लोगों के लिये अदालतों में साक्ष्य पेश करना उतना ही आसान है जितना किसी का बाजार से पैसे देकर कोई सामान खरीदकर ले आना। बहरहाल, ऊपर दर्शाये गये कैदी के निर्दोष होने का प्रमाण हम इसे मान लेते हैं कि उसने मुझे जो पत्र लिखा उसमें उसने कहीं भी अपना नाम या पता नहीं दिया जिससे यह अंदाज लगाया जा सकता, कि वह मुझसे कुछ नहीं चाहता। लेकिन मै अपनी कलम से सरकार व अदालतों का ध्यान कम से कम ऐसे लोगों की ओर आकर्षित कर सकूं कि वह प्रभावशाली व पहुंच वाले लोगों के झांसे में न आयें और उसके जैसे किसी निर्दोष व्यक्ति को सलाखों के पीछे सडऩेे न दें। असल में हम जिस व्यवस्था में जी रहे हैं। उसमें किसी का किसी से कोई लेना- देना नहीं है। कानून यह कहता है कि ''सौ गुनाहगार छूट जायें, मगर किसी एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिये।ÓÓ लेकिन क्या ऐसा हो रहा है? कितने ही सीधे साधे लोग आज पैसे व पहुंच वालों की कोप के शिकार बनकर किसी न किसी बड़े मामले में फंसा दिये जाते हैं, और उन्हें सजा भी हो जाती है। चौका देने वाली बात तो यह है कि हमारे कानून में ऐसा कोई प्रावधान भी नहीं है कि एक बार लम्बी सजा प्राप्त व्यक्ति की वास्तविकता के बारे में खोजबीन करने का कोई प्रयास किसी स्तर पर किया जाये। देश में मानवता की दुहाई देने वाले रक्षक भी इस संबन्ध में खामोश हैं । पूरे देशभर की जेलों में सड़ रहे कैदियों की हकीकत का किसी झूठ या सच का पता लगाने वाली मशीन से आंकलन किया जाये तो ऐसे कम से कम पांच से दस प्रतिशत तो कैदी ऐसे निकल ही जायेगें जो किसी न किसी के षडय़ंत्र का शिकार हुए हैं। सरकार को इस दिशा में प्रयास करना चाहिये। वह अपने जासूसों के जरिये ही कम से कम असली -नकली का पता लगाये और मानवता के नाते उन्हें जेल से मुक्ति दे।