सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

ऊची दुकान फीके पकवान!

रायपुर दिनांक 4 अक्टूबर 2010

ऊँची दुकान फीके पक वान!
कभी बच्चो को परोसे जाने वाला मध्यान्ह भोजन तो कभी होटल, रेस्टोरेंट से खरीदी गई खाने की सामग्री तो कभी किसी समारोह में वितरित होने वाले भोजन के जहरीले होने और उसको खाने से लोगों के बीमार पडऩे की बात आम हो गई हैं। अभी बीते सप्ताह शनिवार को नई राजधानी में सड़क निर्माण कंपनी के मेस का खाना खाकर कई मजदूर बीमार हो गये। कइयों की हालत गंभीर थी। मेस को हैदराबाद की बीएससीपीएल इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी चला रही थी। सबसे पहला सवाल यह उठता है कि जब कोई कंपनी या समारोह में इतने व्यक्तियों का खाना एक साथ पकता है उसे लोगों में बांटने के पहले जांच क्यों नहीं होती? खाना बनाने से पहले यह क्यों नहीं देखा जाता कि जहां खाना बनाया जा रहा है वहां का वातावरण पूर्ण साफ सुथरा है या नहीं। स्कूलों में बच्चों को वितरित होने वाले मध्यान्ह भोजन में भी कुछ इसी तरह का होता आ रहा है। बच्चो को जो खाना बनाने के लिये कच्चा माल पहुँचता है उसका उपयोग करने से पहले उसकी सही जांच पड़ताल नहीं होती फलत: उसमें कीड़े मकोड़े व अन्य जीव जन्तु भी मिल जाते हैं। अक्सर समारोह व शादी ब्याह में सैकड़ों लोगों के लिये खाना बनता है जब वह बनकर आता है तो सभी को अच्छा लगता है किंतु उसे किन परिस्थितियों में बनाया जाता है यह सोचने का वक्त किसी को नहीं मिलता चूंकि भूख भी अच्छी लगी रहती है। घर परिवार में खाना बनाते समय प्राय: लोग पूरा ख्याल रखते है। पहले रसोई के झाडू पोछे से लेकर बर्तन की सफाई और अपने स्वयं के हाथ पैर साफ करके ही लोग खाना बनाते हैं किंतु क्या होटल व आयोजनो तथा मेस चलाने वाले ऐसा करते हैं? अभी कुछ दिनों पर्व नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारियों ने टाटीबद के एक प्रसिद्व मिष्ठान भंडार कोलकता स्वीट में छापा मारा तो अविश्वसनीय गड़बडियों का खुलासा हुआ। जो स्वीट्स लेने के लिये लोग लाइन में खड़े रहते थे उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उसे बनाने की जगह इतनी गंदी थी कि वहां कोई दो मिनिट भी खड़े नहीं रह सकता है। इसी प्रकार बनाने वाले कभी नहाते भी है यह तक संदिग्ध लग रहा था। शहर की कई होटले इसी प्रकार की मिलेंगी जिसपर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। महोबाबाजार स्थित एक बडी होटल में कई दिन से फ्रिज में रखा चिकन पकाकर ग्राहकों को खिलाने का रहस्योद्धाटन बहु्त पहले हो चुका है जबकि कई होटल राजधानी में ऐसे भी है जहां पकवान बनने वाले स्थल पर कर्मचारियों के अंडर गारमेंट सूखते नजर आते हैं.। जब शहर के बड़े बड़े संस्थान जहां बाहर से कुछ और अंदर से कुछ का माहौल है तो इन गरीब मजूदरेो को पक ने वाले खाने और उससे उनके बीमार होने पर कोसने से क्या फायदा? असल में इन सबकी जांच का दायित्व जिन लोगों को सौंपा गया है वे कभी कभी ही जागते है-होटलों और मेस चलाने वालों को अकेले दोष देने से कोई मतलब नहीं असल में कार्रवाई होनी चाहिये उन जिम्मेदार अफसरों पर जिन्हे लोगों के खाने पीने के मामले में स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।