सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

नेताओं के मसखरे बयानो के सफर मेंजुड़े अब राष्ट्र विरोधी कलमकार !

रायपुर गुरूवार 28 अक्टूबर 2010
नेताओं के मसखरे बयानो के सफर में
जुड़े अब राष्ट्र विरोधी कलमकार !
सुनिये हमारे राजनेता क्या कहते हैं-
बाल ठाकरे नकलची बिल्ली हैं- राज ठाकरे
राहुल गांधी को गंगा में फेंक देना चाहिये- शरद यादव
राज की मनसे चूहों की पार्टी है- बाल ठाकरे
आरएसएस और सिमी में कोई फर्क नहीं।-राहुल गांधी
और इन सबसे हटकर अपनी लोकप्रियता को चार चांद लगाने के लिये समाज सेविका और प्रख्यात लेखिका क्या कहती हैं सुनिये-कश्मीर शुरू से भारत का अंग नहीं है, इतिहास इसका गवाह है। भारत सरकार ने इसे स्वीकार किया है-अरुंधति राय
जो चाहे बोलो-जो चाहे करो और जितना चाहे पैसा अपनी पेटियों में भरते जाओ और जगह नहीं तो गुसलखाने और कुत्ते को बांधने के कमरों में भी भरते जाओ। लोगों को मिली इस आजादी को हम क्या कहें? मनमानी, एक अच्छे लोकतंत्र की निशानी या लोगों के मुंह में लगाम नहीं अथवा अनाप शनाप छूट? शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने अपने पूरे परिवार को राजनीति में उतार दिया। राज ठाकरे, उद्वव ठाकरे, बहू स्मिता ठाकरे और अब भतीजे आदित्य ठाकरे। महाराष्ट्र तथा कुछ अन्य प्रदेशों में सीमित चल रही उनकी राजनीति को कभी भाषा के माध्यम से हवा में लहराया जाता है। तो कभी किसी चैनल या अखबार में तोडफ़ोड़ अथवा आपस में एक दूसरे के विरूद्व बयान को हवा देकर। लालू प्रसाद,अमर सिंह जैसे कुछ अन्य नेताओं की जुबान पर भी लगाम नहीं। लालू भी अब परिवारवाद पर उतर आये हैं। लानू के बाद बेटे को भी राजनीति के मैदान में लाकर खडा कर दिया। जनता नेताओं के पैतरे नहीं समझती। अत: वह उनके कारनामों व बयानों का मजा लेकर उसके पीछे भागती है। बिहार में चुनाव के दौरान जो प्रमुख आरोप- प्रत्यारोप हुए, उसमें शरद यादव का बयान इन दिनों चर्चा में हैं। वे कहते हैं कि कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी को गंगा में फेंक देना चाहिये। सोचिये इस बयान का क्या मतलब है? सिवाय सुनने वालों में से कुछ लोग भीड़ में खिलखिलाकर हसें और मजा लें। राहुल गांधी के एक राजनीतिक बयान ने भी अच्छा खासा हंगामा खड़ा किया हुआ है। उन्होंने आरएसएस और सिमी को एक ही चट्टे बट्टे का कह दिया। रांची-पटना की अदालत तक यह मामला पहुंच गया। जनता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने और अपना नाम फैलाने के लिये संविधान में प्रदत्त अधिकारों का किस तरह दुरूपयोग हो रहा है। वह है प्रख्यात लेखिका अरुंधति राय का वह बयान जो उन्होंने जम्मू कश्मीर के एक सेमिनार में दिया। जहां उन्होंने कश्मीर को भारत का अंग होने से ही इंकार कर दिया। इससे पूर्व इसी लेखिका ने नक्सलियों द्वारा की जा रही हिंसा को परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जायज ठहराया था। भारतीय संविधान में प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता के अधिकार के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि वह देश की अखंडता और संप्रभुता के खिलाफ कुछ भी बयान दे। देश में राजनेताओं के अलावा समाज और साहित्य से जुड़े लोगों के इस तरह सार्वजनिक स्थलों पर बयान देने, आरोप- प्रत्यारोप पर हमारी न्याय पालिका कौन सा रूख अपनाती है? यह तो समय के गर्भ में है लेकिन अगर ब्यक्ति अपने अधिकार से बाहर जाकर कोई बयान दें या फिर राष्ट्र विरोधी कार्य करे तो न्यायपालिका, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका तीनों को ही संयुक्त कार्रवाही के लिये आगे आना चाहिये। अगर जरूरत पड़े तो इसके लिए कड़े कानून पर भी विचार किया जाना चाहिये। यह एक अरुंधति का अकेला सवाल नहीं है। अरुंधति ने खुले आम यह बात कही तो कानून के कान खड़े हो गये, लेकिन ऐसीे राष्ट्र विरोधी बातों को छोड़ दें तो राष्ट्र विरोधी हरकतों में भी लोग लगे हुए हैं। उनको भी छांटकर बाहर निकाला जाना चाहिये।